चलो गायों के पालन-पोषण पर सरकारी सजगता तो जगी!

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अब अभयारण्यों में आप गायों को विचरण करते हुए देख सकेंगे। राजस्थान का पहला गौ अभयारण्य बीकानेर  जिले के नापासर गांव के करीब एक हजार गोवंश के साथ शुरू होगा। कुल अभयारण्य का क्षेत्रफल होगा 221 हैक्टर। इस पर सरकार खर्च करेगी 10 करोड़ रुपये। जैसा सरकार ने बताया है कि अभयारण्य बनाने का मुख्य उद्देश्य है- अपंग, बूढ़े, निराश्रित, गो तस्करी से छुड़ाए गए गोवंश का संरक्षण एवं संवर्धन करना है। यह अभयारण्य सार्वजनिक सहभागिता (पीपीडी) के आधार पर होगा। आखिर सार्वजनिक सहभागिता तो भारतवासी की गोवंश के प्रति सदैव सदियों से रही है। आखिर यह सहभागिता कम क्यों हुई? इसके मूल कारणों में जाना चाहिए। भारत के विशाल वनों में, जंगलों में, ग्रामीण क्षेत्रों में सदैव गोवंश का विचरण आपको हजारों की तादाद में नजर आता रहा है। कम क्यों हुआ। आज चारा कितना महंगा है? हराभरा तो और भी महंगा है। और पशु आहार की कीमतें तो आसमान छूने लगी है। गोवंश के लिए पेयजल तक सुलभ नहीं है। हमारी यह परम्परा रही है कि गोपालन करने वाले गोपालक अपनी गायों को भोर में ही चरने के लिए जंगलों में भेज देते थे। ग्वाला उन गायों को हरे भरे चारा वाले क्षेत्रों, ताल तलैया अथवा कुआ वाले क्षेत्रों में दिन भर चराता और पानी भी पिलाता। चरने को भेजने के लिए यहां एक शब्द का प्रयोग होता था- 'अछेर देनाÓ गोवंश के लिए विशाल गोचर भूमियां कई हैक्टरों में होती थी। आसपास ही पेयजल के साधन होते थे। यहीं नहीं, पशुओं के लिए चारागाह होते थे। शाम को जब गोवंश ताजा हरी घास चर कर लौटता तो पशुपालक उन्हें चारा (ग्वार, खली और गोग्रास) मिलाकर उन्हें देते यही उनका पशु आहार होता, जो पौष्टिक भी होता था। आज चारा, ग्वार, खली व अन्य पशु आहार महंगे हो गए। गोपालक अपना ही पेट नहीं पाल पाते तो फिर गोवंश कैसे पाले? गोचर भूमियां भी धन्ना सेठ, सामंत, जागीरदार, राजामहाराजा उपलब्ध कराते। पेयजल की साधन सुविधाएं भी वे ही सुलभ कराते। अत: गोपालक पर कोई भार नहीं पड़ता। पशुधन विशेषकर ऊंट, घोड़े, गधे आदि कम होने के भी यही कारण है। दरअसल में थोथी परम्परागत जन सहभागिता जो, हमारी संस्कृति व सभ्यता का अभिन्न अंग थी। धीरे-धीरे विलुप्त हो गई। उस समय से आज तक राजस्थान में गो शालाओं का पारम्परिक चलन भी चलता रहा। आज भी देश की प्रमुख और सुव्यवस्थित गो शालाओं में राजस्थान अग्रणी है। यहीं नहीं पिंजरापोल की प्रथा भी राजस्थान में ही है। अपंग, वृद्ध, अशक्त, बीमार गोवंश का पालन पोषण, सेवा सुश्रपा, चिकित्सा भी वहीं होती हैं। इसमें कुछ सहयोग और अनुदान सरकार देती है लेकिन अधिकांश योगदान समाज के दानदाता, गोवंश प्रेमी ही देते हैं। ऐसा नहीं है कि राजस्थान के गोपालन विभाग को इसकी जानकारी नहीं है। गोवंश पूज्य एवं वंदनीय मानने की परम्परा भी आज यहां से विलुप्त नहीं हुई है। आज का अभयारण्य भी सामाजिक सहभागिता का ही एक हिस्सा है। यदि इस सहभागिता को पुनर्जीवित किया और उसकी आदरपूर्वक अभिवृद्धि की गई तो यह गोवंश को समृद्ध बनाने की एक श्वेत क्रांति होगी। क्योंकि यहां के जनमानस में गाय देवी-देवताओं का प्रतीक है। यहां गोपाष्टमी, बछबारस (वत्स द्वादशी) गोवर्धन पूजा, गोग्रास के रूप में गाय की रोटी निकालने की एक पूण्य-प्रथा का चलन आज भी जारी है। इसे केवल धार्मिक दृष्टिकोण से न देखकर पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने की दृष्टि से भी देखा जाए। तब आपको पूरे प्रदेश में गायों के हजारों झुंड जगह-जगह ग्रामीण क्षेत्रों, अभयारण्यों में चरते, विचरते नजर आएंगे और उनके जल स्त्रोत ताल-तलैया, नाडे-नाडिय़ों में पानी पीते भी नजर आएंगे। यह गोवंश हमारे सकल घरेलू  उत्पादन की भी अभिवृद्धि करेगा।

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