मायूस है बीजेपी कार्यकर्ता

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हालांकि 15वीं विधानसभा के चुनाव में 'अथक परिश्रम' करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं को निवर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने धन्यवाद तो दिया है, लेकिन ये कार्यकर्ता आज बहुत ज्यादा मायूस है। क्योंकि चुनाव से पूर्व उन्हें सत्ता और संगठन से वह तवज्जो नहीं मिली, सम्मान नहीं मिला जिसकी उन्हें अपेक्षा थी। यही नहीं पिछले चार सालों से संगठन का ढाचा लुंजपुंज था। पूर्व अध्यक्ष अशोक परनामी ने प्रेरक बन कर भाजपा संगठन के लिए अपेक्षित कार्य नहीं किया। सत्ता ने भी संगठन के इस ढीले ढांचे पर गौर नहीं किया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जब संगठन के ढांचे को मजबूत करने के लिए चंद्रशेखर को उत्तर प्रदेश से यहा भेज कर संगठन मंत्री बनाया तो वे भी पूरे प्रदेश के भाजपा कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित नहीं कर पाए। राजस्थान भाजपा का विधायक दल ही अपने-अपने क्षेत्र में संगठन का सर्वेसर्वा बनकर काम देखता रहा। सत्ता के शीर्ष नेताओं और सीएमओ ने भी उन्हें ही तरजीह दी। भाजपा आलाकमान ने अशोक परनामी के इस्तीफे के बाद जब पहले अर्जुन मेघवाल और बाद में गजेन्द्र सिंह शेखावत (दोनों केन्द्रीय मंत्री) को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाकर भेजने का प्रस्ताव किया तो स्वयं सत्ता के शीर्ष नेता मुख्यमंत्री ने ही इसका विरोध जातीय समीकरण की वजह से किया। बाद में वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष मदनलाल सैनी के नाम पर सहमति हुई। तब तक कार्यकर्ता संगठन और सत्ता से शनै: शनै: दूर होता चला गया। पहले यदि सत्ता तक कार्यकर्ताओं की पहुंच नहीं हो पाती थी तो तबके संगठन मंत्री गुप्ता के माध्यम से संबंधित मंत्रियों तक पहुंच हो जाती थी। इस चुनाव में भी संगठन स्तर पर कोई प्रचार प्रसार और कार्यकर्ताओं को 'मोटीवेट' करने की चुनाव नीति तैयार नहीं हुई। जो कुछ भी हुआ वह सी.एम.ओ. स्तर से हुआ। जनसहभागिता की आवाज उठाने वाली भापजा सरकार कार्यकर्ताओं की समर्पित और सक्रिय सहभागिता चुनावों में नहीं जुटा पाई। संगठन कौशल में महारात हासिल करने वाली भाजपा एक शिथिल संगठन वाली पार्टी बन गई। यह चुनाव प्रचार बूथ मैनेजमेंट, सत्ता प्रतिनिधि की उदासीनता से देखा जा सकता था। संगठन की बजाय विधायक दल और विधायक को ही 'हेवी हेण्ड' मिला। इस और किसी ने भी गंभीरता से गौर नहीं किया। हर क्षेत्र में चुनाव प्रचार और मुद्दे कौन से उठाए जाएं भी तय नहीं था। बस कांग्रेस आरोपों का भी प्रत्यारोप और जवाब देने तक ही प्रचार सिमट गया। जबकि भाजपा संगठन अपनी सरकार के प्रभावशाली और लोकलुभावने कामों का कार्यकर्ताओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाकर उन्हें जमीनी हकीकत नहीं बता सकी। सत्ता और संगठन का समन्वय भी व्यक्ति केन्द्रित रह गया। संगठन केन्द्रित नहीं। अब लगातार एक साल तक और वह भी चुनाव के पूर्ववत तक यही स्थिति रहे तो इसका असर होना तो स्वाभाविक है। हालांकि कांग्रेस स्वयं अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सकी। यदि कार्यकर्ताओं की फौज को इसमें छह माह पूर्व ही जुटा दिया जाता तो आज यह मायूसी नही देखी जाती। अब इस मायूरी को कौन दूर करेगा?

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