डबल इंजन की गाड़ी चली-छुक-छुक-छुक

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उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने कहा है कि चूंकि राजस्थान सरकार की गाड़ी डबल इंजन की है इसलिए ज्यादा अच्छी तरह से चलेगी। यह सही है भी है कि चाहे बिजली से अथवा डीजल से चलने वाली दो इंजनों की गाड़ी गति से ही चलती है। बस जरूरत है दोनों इंजनों को जोडऩे वाला (कफलिंक) जुड़ाव मजबूत हो। टाइट हो। कसा हुआ हो। परस्पर अनुकूलता से भरा हो। बीच मेें छिटने वाला नहीं हो। दोनों की स्पीड और अन्दरूनी कलपूर्जे भी सही जुड़े हुए हो। फिर शांर्टिंग के समय भी यह ध्यान रखना होगा कि कोई  दोनों का जुड़ाव ढीला न कर दें। परम्परा तो यह रही है कि मुख्यमंत्री ही उप मुख्यमंत्री का चयन करता है। चाहे राजनीतिक दबाव से अथवा पार्टी आलाकमान के दबाव से। इस बार का दबाव पार्टी आलाकमान का है। थोड़ी बहुत प्रेशर पालिटिक्स भी है। लेकिन अभी तो यह बयानबाजी है। अभी इंजनों का चलना बाकी है। वैसे दोनों इंजन अलग-अलग यार्डों में रहेंगे। मुख्यमंत्री रहेंगे नवनिर्मित, साज सज्जायुक्त सीएमओ भवन में और उप मुख्यमंत्री का यार्ड रहेगा सचिवालय का मुख्य भवन (पुराना सचिवालय) अभी इंजनों के साथ चलने वाला स्टाफ, गार्ड, झंडी दिखाने वाले फ्लेग मैन, लाईन क्लियर देने वाले सिंग्नल भी तय होने वाले हैं। जो भी हो दोनों का मकसद व्यवस्था परिवर्तन है। अब इन दोनों इंजनों में जो अन्दरूनी महत्वांकांक्षाएं है, बैचेनियां है, क्या वे एक ही पटरी पर एक स्पीड से मसलों को हल कर पाएंगी? क्योंकि एक ईंजन नम्बर दो के पास प्रदेश संगठन का गुरूत्तर दायित्व प्रदेश अध्यक्ष पद भी है, क्या वह अध्यक्ष पद का कार्य निर्वहन उसी गति से कर पाएंगे जितनी गति से एकल इंजन करता है? क्या अध्यक्ष पद की गरिमा, गौरव भी वैसा ही बना पाएंगे, जैसा अब तक कर पाए हैं? क्योंकि प्रशासन, सरकार और संगठन का उद्देश्य भले ही एक हो लेकिन सबकी घुटियां अलग-अलग है।

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