अब आज का वृन्दावन राजस्थान का सीमान्त ही है

img

सदियों से अकाल और सूखे की मार झेल रहे राजस्थान के चार सीमान्त जिले श्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर में ही सर्वाधिक गोपालक हैं। जब सूखे और अकाल के दौर में खेती-बाड़ी नहीं होती थी तो किसानों, ग्रामीणों और पशुपालकों की आजीविका का वैकल्पिक साधन था पशुपालन। पशुओं में अधिकांश गौवंश ही होता था। फिर भेड़, बकरी, ऊंट, घोड़े वगैरहा। गायों की सघनता इन्हीं सीमान्त जिलों में ही थी और अधिकांश गौपाल मुसलमान होते थे। गाय का वे सम्मान करते थे। तब 1140 किलोमीटर लम्बी राजस्थान से सटी भारत- पाक सीमा पर साम्प्रदायिक वैमन्स्य नहीं था। साम्प्रदायिक सद्भाव था। चप्पे-चप्पे में गाए गोचर भूमियो, चारागाहों में चरती नजर आती थी। इन्हीं गोचर भूमियों के पास तालाब, कुएं और बावडिय़ां होती थी। इन्हीं से इस गोवंश, बकरी, भेड़ तथा ऊंट वंश को पानी पिलाया जाता था। चारे खर्च का भार पशुपालक पर नहीं पड़ता था। लेकिन आज चारा महंगा होने की वजह से यह भार बढ़ता ही जा रहा है। इसलिए इन क्षेत्रों में गौवंश का पालन कम हो गया। बीकानेर में आज भी मगए क्षेत्र में भरपूर गोपालन हो रहा है। आज भी बीकानेर और आसपास के क्षेत्रों मे गाय का दूध ही सर्वाधिक सुलभ है। भैस पालक इस इलाके में नगण्य है। दूध-दही की आज भी इस इलाके में बहार है। हालांकि पहल जैसी नहीं। इन्हीं सीमान्त जिले में यह कहावत प्रचलित थी कि दूधों नहाओं पूतों फलों, यानी दूध से स्नान करो और पुत्रवान हो। सरकार को यह सोचना होगा कि पशुपालकों पर चारे व पानी के खर्चांे का भार कम पड़े इसलिए गोचर भूमियों, चारागाहों और पेयजल स्त्रोतों विशेषकर जन स्वावलंबन योजना का विस्तार करें। जमीनी हकीकत दें। तभी यह सीमान्त क्षेत्र फिर से देश की बृज और वृन्दावन भूमि बन सकेगी।

tyfu6tu whatsapp mail