थम गया शोर, अब घर-घर दौर

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चुनावी मंच पर सभा में वोट मांगते नेता जुबान से लोकतंत्र चला रहे थे। असहिष्णुभाषा, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, मुद्दा विहीन भाषण, यहां तक कि गाली गलौच और एक दूसरे को ललकारने की चुनावी रैलियों को आज सायं पांच बजे से विराम लग गया था। अब?  एक ईंच मुस्कान के साथ हाथ जोड़े घर-घर मत संपर्क के लिए घर-घर जायेंगे। ऐसे विनम्र की जैसे जिन्दगी की सारी विनम्रता उन्होंने ही घोलकर पी ली है। झुक-झ़ुककर और लुड-लुडकर अभिवादन चुनावी घोषणाएं नहीं बल्कि व्यक्तिगत आश्वासन, जिसका कोई रिकार्ड नहीं। बस प्रत्याशी ने कहा और मतदाता ने सुना। मतदाता ने प्रत्याशी के जाने के बाद कहा- अब पांच साल बाद धोकने आएंगे। इससे पहले हम मिलने जाएं तो पहिचानेंगे नही। और यह एक ईंच डिंपल वाली मुस्कान की जगह गंभीर सुख था। ऐसा होना ही था। कहा भी है कि मतलब निकल गया तो पहिचानते नहीं। क्या होगा। पांच साल बाद फिर वहीं होगा। लेकिन  अब सात को वोट और 11 दिसम्बर को चुनाव परिणाम। फिर शोर शोर या जीत का जश्न। जुलूस। ढोल-बाजे। शोभा यात्रा। विजय समारोह और फिर वे अपने दज्बे में और हम अपने घर में। हो गया जनतंत्र का पांच वर्षीय खेल। लेकिन जो भी हो इस असहिष्णुता भरे माहौल और असंवेदनाशील भाषा से तो निजात मिली। क्या हमारा जनतंत्र परिपक्व हो रहा है? चुनाव मतदान में तो हो रहा है। लेकिन सिद्धान्त तो और तौर-तरीकों में अभी अपरिपक्व है। चलो, चलते-चलते, करते-करते धीरे-धीरे सुधार आएगा। आएगा तभी जब सभी दलों के नेता गंभीरता से इस पर सोचेंगे-विचारेंगे और चुनाव माहौल में सहिष्णुता लाने का संकल्प करेंगे।

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