भैंसों का अपहरण

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बात यहां तक पहुंच जाएगी इसका अंदाजा किसी को नहीं था। खुद मालिक ने नहीं सोचा था कि यह दिन देखने पड़ जाएंगे। एक चमाट की लाली मिटी ही नहीं कि दूसरा लाफा लग गया। हमारी तो यही प्रार्थना है कि चंपा-चमेली-सकुशल लौट आएं आगे हरी इच्छा। भाई मंत्री या उस का रिश्तेदार होता तो पलटन गली-गुवाडिय़ां नाप लेती। बिचारों को कौन पूछे। गई तो गई। अफसोस जताया और मामला नक्की। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे। बात कहां से कहां पहुंच जाना कोई नई बात नहीं है। इसके बावजूद हम-आप जैसे लोग समझ नहीं सके। हमारी पीढी के बंदे ऐसे नहीं है। जो राम प्यारे हो गए, वो भी ऐसे नहीं थे। हमें नहीं पता कि आप क्या सोचते-करते होंगे फिर भी पास में बिराज गए। भले ही आप हम से जूनियर हों। समकालीन हों तब तो कोई दिक्कत ही नहीं। वरिष्ठों के साथ बैठकर कुछ ना कुछ तो सीखा ही होगा। यही सोच कर हम ने आप से जोड दिया। चाहते तो खालिस 'हम' लिख सकते थे। खाली 'मैं' का प्रयोग किया जा सकता था। क्यूंकि इसे अहम और घमंड से जोड़ दिया गया है इसलिए 'हम-आप' लिखने पर गर्व हुआ। आज मानखा एकदम अकेला। एकदम तन्हा। स्वार्थ और खुदगर्जी ने रिश्ते कुतर दिए। घर मकान में बदल गए। कौम-जमातों में खाई खुद गई। कई के पास सब कुछ होते हुए कुछ भी नहीं। सुख-सुविधाओं के पूरे इंतजाम पर मन की शांति काफूर। ऐसे में दुखियारे-दुखियारे मिल कर दुख हलका करने में क्या दिक्कत है। तू मुझे सुना-मैं तुझे सुनाऊं अपनी राम कहानी। इसीलिए हम के साथ आप को जोड़ दिया। जुड़ते ही मजा आ गया। कहां मैं, कहां हम और कहां हम-आप। इस हम-आप में आखा देश-आखी दुनिया। हमारे बखत के लोग सहज-सादे और सरल थे। जुबान के धणी। बड़ी सोच के मालिक। एक दम ठावे-एकदम खरे। हलकी बात करना तो दूर हलकी सोच रखने की सोच ही दिमाग में नहीं आती। मजाल पड़ी जो यहां की बात वहां हो जाती। बड़े दिल के साथ बड़े पेट के मालिक। आजकल बिना बात का बखेड़ा हो जाता है। बिना बात के बातें बना दी जाती है। पर वो लोग ऐसे नहीं थे। आई-बाबा यहां से वहां करने में रमे रहते तो बुरा दौर उस समय से शुरू हो गया होता। उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि बात यहां तक पहुंच जाएगी। आज भैंसिया लपेटे में आई। कल बकरी-गाय और कुत्तों पर गाज गिर सकती है। आज चंपा-चमेली का अपहरण हुआ, कल को टॉमी-टॉनी का नंबर आ सकता है। अपने यहां हरण-चीरहरण की वारदातें पुरातनकाल से होती रही हैं। हरण का लोकार्पण रावण और चीरहरण का लोकार्पण दुशासन ने किया। वो तो करकुरा के चले गए, अनुयायी आज भी उनके पदचिन्हों पर चल रहे हैं। डाकू भाई पईसों के लिए अपहरण किया करते थे। फिरौती की रकम दो और पकड़ छुड़वाओ। यह उन का साईड बिजनेस था। मूल व्यवसाय धाड़े मारना। लूटपाट करना और मौका मिल जाए तो किसी को उठा के ले जाना। डाकू-दस्यु गिरोह का खात्मा हुआ तो भाई परगट हो गए। उन्होंने इस धंधे को आगे बढाया। कोई रकम देकर पकड़ छुड़वा लेता, कोई पुलिस की शरण में चला जाता। कई दफे अपहरणकर्ता पकडे जाते, बाजवक्त 'पकड़' के साथ अनहोनी हो जाती। पर वहां अजब-गजब वारदात हो गई। अपहरणकर्ता के हाथ चंपा-चमेली तक पहुंच गए। चंपा-चमेली नामकरण हथाईबाजों द्वारा किया गया। असल में वो भैंसें हैं। हमने उनका नाम रख दिया। चंपा-चमेली के साथ दो भैंसे और, तो हो गई चार। भरतपुर निवासी एक पशुपालक के तबले से चार भैंसें गायब हो गई। मालिक ने सोचा कि हमेशा की तरह बाहर चराचुरा के शाम को वापस लौट आएंगी, पर ऐसा नहीं हुआ। ढूंढ की। पूरा क्षेत्र छान मारा पर भैंसे नहीं मिली। इस बीच फोन आया कि तुम्हारी भैंसे हमारे कब्जे में है, सुरक्षित वापसी चाहते हो तो एक लाख रूपए फलां स्थान पर पहुंचा दो। पशुपालक ने पचास हजार रूपए पहुंचा दिए मगर भैंसे नहीं मिली। इस पर उसने पुलिस की शरण ली। मामला दर्ज हो गया। तहकीकात में भैंसों के हरियाणा के मेवात क्षेत्र में होने की जानकारी मिली। पुलिस अपहरणियों और भैंसों की सरगरमी से तलाश कर रही है। हथाईबाजों ने पशुओं की चोरी के बारे में तो सुना। भैंसों का अपहरण कर फिरौती वसूली की बात पहली बार सामने आई। कल को कुत्ते-बिल्ली का नंबर ना आ जाए। 

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