मरवा दिया वॉट्सएप ने

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किसे पता था कि बात यहां तक पहुंच जाएगी। पहले बने-बनाए के टूटने बिखरने की खबरें आईं। अब बनने से पहले ही बिखराव शुरू हो गया। बनाने वाले ने तो सुविधा के लिए बनाया था उसे क्या पता था कि पहले तलाक और फिर निकाह कबूल ना होने का बिस्मिल्लाह हो जाएगा। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे। लोग भले ही ना-नुकर करें। ललाट पे सलवटें डालें। नाक-भौंह,सिकोडें़। सच तो यह है कि सुविधा का दुरूपयोग करना हमारी फितरत बनता जा रहा है।  ऐसा करना लोगों की आदत में शुमार हो चला है। हम वही काम करने के लिए उतावले रहते हैं जिन की मनाही की जाती है। हथाईबाज मानखे की इस लत पर पहले भी लानत डाल चुके हैं। लोगों का मांजणा पाड़ चुके है-पर किसी पे कोई असर होता नहीं दिखा। ऐसा बार-बार किया जाए तो भी कोई फरक पडऩे वाला नहीं। हथाईबाज ज्यादा कुछ कह-कर नहीं सकते अलबत्ता एक बार फिर कागद कारे तो कर सकते हैं। हम वाहन वहीं खड़े करने से बाज नहीं आते जहां-'यहां वाहन खडे ना करें की सूचना लिखा बोर्ड टंगा हो। आप ने अस्पतालों की दीवारों के कोने, गमले और यहां-वहां स्थापित जल मंदिर और पानी की मशीने तो देख ही रखी होगी। वहां बड़े-बड़े हरफों में 'यहां ना थूकें अथवा यहां गंदगी ना करें' लिखा नजर आ जाएगा। पर लोगबाग वहीं 'पिच्च' करने से बाज नहीं आते। दीवारें लाल। गमले लाल। पानी की मशीनों के आसपास गंदगी। यह कृत्य बाहरी तत्व तो करने से रहे। यह कृत्य रोगियों के परिजनों और रोगियों से मिलने आने वाले रिश्तेदारों और मिलने वालों का। हमने 'यहां कचरा ना डालें लिखी ऐसी दीवारें भी देख रखी है-जहां गंदगी के ढेर लगे हैं। पूरा क्षेत्र 'उकरड़ी' नजर आता है। सार्वजनिक सुविधाओं की हालत तो इतनी खस्ता कि सुविधा का उपयोग करते समय सांस रोकनी पड़ती है। आंखें बंद करनी पड़ती है। आप को याद होगा। पिछले दिनों स्थानीय निकायों ने प्लास्टिक के कचरा पात्र लगवाए थे। हम इतने अधरजादे कि उसमें कचरा डालने से परहेज। कचरा-पात्र के चारों ओर गंदगी नजर आ जाएगी। पिछले दिनों निकायों ने कई क्षेत्रों में सार्वजनिक मूत्रालय स्थापित करवाए। उन की स्थिति भी बद से बदतर। टट्टी से भरे पड़े। लोगबाग उस में लगाए पॉट-टूटिएं और पाइप उखाड़ के ले गए। कहीं दरवाजे के दरवाजे गायब। किसी को अपनी जिम्मेदारी निभाने की फुरसत नहीं और बदनाम करते हैं शासन-प्रशासन को। सुविधा का उपयोग किया जाए तो सब  के लिए अच्छा। दुरूपयोग से किसी का भला होने वाला नहीं। कई बार बुरा पराकाष्ठा भी लांघ जाता है। इतना बुरा हो जाता है-जिस का खटका भी नहीं होता। ऐसा अनर्थ हो जाता है जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
अगर कोई किसी साधन-सुविधा का उपयोग-सदुपयोग करे तो किसी को क्या एतराज हो सकता है पर ऐसा हो नहीं रहा। पहले हम सुविधा जुटाते हैं और जब सुविधा जुट जाती है तो उस का दुरूपयोग शुरू हो जाता है। मुआं मोबाइल इस की सबसे ताजातरीन मिसाल। टुनटुने ने पूरे देश का खाका-ढांचा बिगाड़ के रख दिया। जिसे देखो वो मोबाइल में घुसा नजर आता है। टुनटुने ने रिश्ते सिमटा दिए। मेल-मुलाकातें कम करवा दी। फेसबुक ने फेस-टु-फेस मिलना कुतर डाला। मोबाइल ने झूठ बोलना सीखा दिया। मानखा पहले से ही झूठला था, मोबाइल की आंधी ने उसकी झूठ पे चार चांद लगा दिए। होंगे चांदपोल-बताएंगे महामंदिर। बैठे हैं ताश कूटने और नाम लेंगे मीटिंग का। वार-त्यौंहार, होली-दिवाली और अन्य मुबारक मौकों पर टुनटुने पे शुभकामनाएं दी और मामला नक्की।
हथाईबाजों को यह दस्तूर रास नहीं आ रहा, मगर डिजीटल आंधी के सामने बेबस। आंखें मींच कर, जुबान और कान बंद कर सब कुछ सहन करना पड़ रहा है पर वहां तो बनने से पहले ही तोड़-भांग हो गई। हवा यूपी के अमरोहा क्षेत्र से आई। वहां एक दुल्हे ने एनवक्त पर घोड़ी पे चढने से मना कर दिया। जब बारात ही  नहीं बनी तो निकाह कबूल होने का सवाल ही नहीं। वधु पक्ष वाले फोन करते-करते थक गए। वहां से एक ही जवाब कि बारात लेकर नहीं आ रहे। कारण सामने आया तो आंखें हैरत से फट गई। दुल्हे का आरोप था कि लड़की दिन-रात फेसबुक और वॉट्सएप में लगी रहती है, लिहाजा शादी कैंसिल। कौम-जमात के लोगों ने समझाईश के भतेरे प्रयास किए मगर बात नहीं बनी। बारात नहीं आई। उधर दुल्हन पक्ष का आरोप है कि वर पक्ष ने 65 लाख रूपए की मांग कर दी। हम ने मोबाइल पर तीन तलाक के बेहूदे किस्से सुने। मोबाइल को अफवाहों और किसी को बदनाम करने का अवैध हथियार बनते देखा। टुनटुने ने नई नस्ल को टुन्न कर दिया। बेकार की बातों से मोबाइल कंपनियां करोड़ों कमा रही है और हम दुरूपयोग के तालाब में डुबकी लगाने से बाज नहीं आ रहे। वॉट्सएप के कारण किसी का घर बसने से पहले दरक जाए। यह अच्छा संकेत नहीं है।  वर पक्ष ने दहेज मांगा हो, तो भी अच्छी बात नहीं है।

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