बोबाडि़ए

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राजस्थान की पृष्ठभूमि से जुड़े लोग शीर्षक का अर्थ अच्छी तरह से समझ गए होगें। नई नस्ल का कह नही सकते, हमारी पीढी के लोगों की समझ में भी इस का अर्थ आ गया होगा। जो 'बोबाड़े' करता है उसे ठेठ राजस्थानी में 'बोबाडिय़ा' कहते है। बोबाडा और बोबाडिय़ों का हिन्दीकरण भी आगे चलकर स्पष्ट कर दिया जाएगा। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।
राजस्थानी भाषा का जवाब नहीं। हम इस लिए इस की तारीफ नहीं कर रहे कि यह भाषा हमारी है, वरन इसलिए कर रहे हैं कि राजस्थानी भाषा वाकई में प्यारी है। दुलारी है। मीठी है। जैसे यहां की मीठी बोली, वैसी ही यहां की संस्कृति। राजस्थान की अपणायत के किस्से सात समंदर पार तक कहे-सुने जाते हैं। विश्व का शायद ही ऐसा कोई देश हो जहां राजस्थानियों के डंके ना बजे हो। अपनी मेहनत और लगन से राजस्थानियों ने जो मुकाम हासिल किया उस का कोई सानी नहीं। वीरता-धीरता में भी राजस्थान और राजस्थानी सदैव अग्रणी रहे। जन-सेवा कार्यो मेें भी हमारे बंदों ने हमेशा उल्लेखनीय भूमिका निभाई। राजस्थान का साहित्य अपने आप में अनूठा। बेतादाद खूबियां होने के बावजूद अगर कोई कमी अखरती है, वो वह है राजस्थानी भाषा को अब तक संवैधानिक मान्यता ना मिलना। हथाईबाज इस से पहले भी अपनी पीड़ा व्यक्त कर चुके है। अपना दर्द जता चुके है। अपने छाले दिखा चुके हैं। करोड़ो-करोड़ राजस्थानियो की भाषा आज भी गूंगी है। हम आन-बान और शान के साथ राजस्थानी बोलते हैं। आन-बान और शान के साथ राजस्थानी भाषा में लिखते है। विश्व का सब से बड़ा शब्द कोष राजस्थानी भाषा का, मगर हमारी भाषा आज भी संविधान की आठवीं सूची में स्थान पाने के लिए फडफ़ड़ा रहीं है। राजस्थानी भाषा का साहित्य आसमां छूता नजर आता है। कहावतें, ओखाणे और आडियां एक से बढ़ कर एक। आली से आली। राजिए ने अपने दूहों में कहा ''मतलब री मनुआर, चुपके लावे चूरमों-बिना मतलब, राब ना पावे राजिया...। इसे राजस्थानी भाषा ने शार्ट कट में - ''गरज बावळी है" कह के निपटा दिया। राजस्थानी भाषा ने हिन्दी के साथ कई भाषाओं को प्रोत्साहन दिया। राजस्थानी भाषा ने ऐसे-ऐसे शब्द दिए जो अन्य किसी भाषा में नहीं मिलते। उदाहरण के लिए ''गुमड़ा" ले ल्यो। हिन्दी में सूजन कह दो - गूमड कह द्यो मगर ''गुमड़े" का जवाब नहीं। बात करें बोबाडि़ए की तो इस की महिमा भी अपरम्पार। हिन्दी में इसे बकबकिया कहा जाता है। कई लोग उन्हें वाचाल कहते हैं। ज्यादा बोलने वाले को राजस्थानी में 'बोबाडिय़ा' कहा जाता है। जो खुदी बोलता रहे और सामने वाले की ना सुने उसे ''बोबाडिय़ा" कहा जाता है। चीखे-चिल्लाए तो 'बोबाड़े' और जो इन्हें अंजाम दे वो बोबाडि़ए। गली-गुवाड़ी में किसी के चीखने-चिल्लाने पर अड़ोसी-पड़ोसी कहते भी है क्यूं 'बोबाड़ा' करे है। इस का मतलब ये कि क्यूं चिल्ला रहा है। कोई अंटशंट बकता रहे। कोई बेमतलब बोलता रहे। कोई दिन भर बकता रहे। जो ऊंची आवाज में बात करे। उसे राजस्थानी भाषा में ''बोबाडिय़ा" कहा जाता है। इन दिनों आखे देश में इसी का दौर चल रहा है। चारो तरफ बोबाड़े और गली-गली में बोबाडि़ए। गली-गुवाड़ी से लेकर दिल्ली दरबार तक में 'बकबकियों का बहुमत। एक ढूंढो-तीन हजार मिल जाएंगे। एक जमाने में इस का आंकडा एक हजार पर था। कई सालो से इसी पर अटका रहा। दुनिया कहां से कहां पंहुच गई पर आंकडा जस का तस। हथाईबाजों ने उसे तीन हजार तक पंहुचा दिया। तीन की जगह तेरह हजार कर दो, तो भी कोई गम नहीं। ना कोई कहने वाला ना कोई सुनने वाला। अलबत्ता ''बोबाडि़ए" बेतादाद मिल जाएंगे। हथाईबाज देख रहे है कि इनकी संख्या हर क्षेत्र में बढ़ रही है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जो ''बोबाडि़ए" से अछूता हो। गत दिनों पांच राज्यों के हुए चुनावों में भांत-भांत के ''बोबाडि़ए" नजर आए। चुनावी सभाओ में जनहित के मुद्दे गायब। पंथ-पार्टियो के संकल्प नदारद। सिर्फ-ओ-सिर्फहाके। हाके बोलो तो सिर्फ-ओ-सिर्फ बोबाड़े। सदन में सार्थक बहस और चर्चाओं का टोटा। एक जमाना वो भी था तब पक्ष-विपक्ष में हर मसले मुद्दे पर सार्थक बहस हुआ करती थी। सत्ता पक्ष विपक्ष की बातों को गंभीरता से सुनता था। सुझावों पर अमल करता था। अटलजी बोलते थे तब पूरे सदन में सन्नाटा छा जाता। सदस्य पूरी तल्लीनता और गंभीरता से उन्हें सुनते थे। आज सदन में सार्थक बहसों का टोटा उस की जगह केवल ''बोबाड़े"। इतने हाके कि कार्रवाई बार-बार स्थगित होने के बाद दिन भर के लिए मुल्तवी। अफसोस होता है कि हम ने कैसे-कैसे ''बोबाडिय़ों" को सदन में भेज दिया। हथाईबाजों ने भांत-भांत के बोबाडि़ए देखे। शिक्षालयों से लेकर चिकित्सालयों में बोबाड़े। मंत्रालयों से लेकर सचिवालय में बोबाड़े। विभागों में बोबाड़े। महकमों में बोबाड़े। बाजारो में बोबाड़े। चौबारों में बोबाडि़ए। देख-सुन कर ऐसा लगता है मानो हम आप बोबाडि़स्तान में रह रहे हों। रही सही कसर खबरिया चैनल्स ने पूरी कर दी। चैनल्स पर नित नए विषयों पर बहस होती है। कई बार ग्रुप डिस्कशन होता है। पंथ-पार्टियों के नेता प्रवक्ता आते हैं। थोड़ी देर बाद चर्चा का रूप-सिणगार सब बदल जाते है। मूल विषय गया तेल लेणे। उस के स्थान पर हाके शुरू। बोबाड़े शुरू। कभी-कभार बहस का स्तर इतना घटिया हो जाता है कि पूछो मति। ऐसे बोबाडि़ए नेतों से भगवान बचाए। ऐसे बोबाडि़ए बुद्धिजीवियों से मालिक बचाए। इनसे बचने का एक मात्र तरीका यही कि चैनल बदल दो। कई बार तो अन्य चैनल्स पर भी बोबाड़े और बोबाडि़ए। ऐसे बोबाडिय़ों से नीली छतरी वाला बचाए। 

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