तडी पड़ी!

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इस का मतलब ये हुआ कि 'तड़ी' पड़ ही गई। आशंका तो पहले ही हो गई थी। जिस दिन 'पट्ठ' बजाए उसी दिन लग गया था कि तड़ी अवश्य पडऩी है। वो राजों के वंशज होंगे, तो होंगे। वो महाराजों के कुनबे से होंगे, तो होंगे। यहां तो साफ है। खुल्ले-खाले में है। पार्टी में रहना है तो अनुशासन जरूरी है। दूसरे शब्दों में कहने वाले कह सकते हैं। जैसे हम। जैसे आप। हम-आप कल ठोककर कह सकते हैं-'कांगरेस में यदि रहना होगा...जै राहुल..राहुल कहना होगा..। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे। शुरूआत पीछे से करते हैं। ऐसा करना कोई जुर्म नहीं है। हम आजाद देश के आजाद नागरिक हैं। शुरूआत आगे से करें-बीच में से करें या पीछे से करें। हमारी मरजी। करें या ना करें। करें तो कौन क्या कर लेगा। नहीं करे तो करने के लिए मजबूर कौन कर सकता है। गोविन्द भाई साहब ने चीख-चीख के कहा। सुर में कहा। राग में कहा। गाकर कहा। नाच कर कहा-'मैं चाहे ये करूं..मैं चाहे वो करूं..मेरी मरजी..। आप ने उल्टी गिनती के बारे में तो सुन ही रखा होगा। इसको जिस ने भी रचा। सोच समझ के रचा होगा। वो चाहते तो टेढी गिनती रच सकते थे। एक-तीन-सात-दो-चार। जिसको उपयोग में लेना है-ले वरना मति ले। एक-दो-तीन-चार हो गई सीधी गिनती। इसको गिनने में कोई लोचा नहीं। जिस रफ्तार में सीधी गिनती एक से सौ तक गिनी जाती है। उसी रफ्तार से कोई बंदा उलटी गिनती गिनती गिन के बता दे। सौ से शुरू करे और एक पे आकर रूके। किसी यान के प्रक्षेपण के दौरान ऐसा होता रहा है। उस बखत घड़ी तो फटाफट चलती है मगर गिनने वाला धीरे-धीरे गिनता है। आप सौ से नहीं दस शुरू करते है-'दस..नौ..आठ..सात.. ऐसे करते-करते कांटा एक पे आते ही रॉकेट आकाश की ओर। हमें कई बार इसमें विरोधाभास नजर आता है। यान को ही ले ल्यो। उसके प्रक्षेण के दौरान उलटी गिनती के मथने अलग और किसी का अंत-पतन होने की शंका-आशंका के दौरान की जाने वाले उलटी गिनती के माने अलग। एक में ऊपर दूसरी में नीचे। दूसरी का उपयोग। राजनीति ज्यादा किया जाता है। सियासत बानों की जुल्फों से खेलने  वाले लोग कहते भी हैं-'अब फलां पार्टी की उलटी गिनती शुरू हो गई है। कहीं से आवाज आती है- अब ढीमका चंद की उलटी गिनती शुरू हो गई है। इस के माने वो दावा करते है कि सामने वाले हर होणी है। होती है या नहीं है, इस का फैसला परिणाम के बाद होता है, पर दावे करने में कौन सा पेटरोल खर्च होता है। अब आते हैं कांगरेस में यदि रहना होगा-जै राहुल..राहुल..कहना होगा। राजो-महाराजों के पूर्वज होंगे, तो होंगे। अनुशासन और तड़ी पे। इन सबको एक साथ इस वास्ते निपटाया कि ऐसा करना जरूरी था। एक-एक पर पत्रवाचन करते तो सत्र खल्लास होणे का नाम ही नहीं लेते। कांगरेस बोले तो-गांधी-नेहरू परिवार। देश की इस सबसे पुरानी राजनीति पार्टी में सिर्फ-ओ-सिर्फ एक ही परिवार की चलती रही है। भविष्य की कह नहीं सकते अब तक तो कांगरेस गांधी-नेहरू परिवार की जेबी संस्थान ही नजर आ रही है। जिन लोगों ने नेहरू-इंदिराजी की जी हुजूरी की। जिन लोगों ने राजीव-सोनिया की लल्लो-पुच्चो की, आज वही लोग राहुल गांधी के सेवादार बने हुए हैं। उनके पोते-पोतिएं और दोहिते-दोहितिएं राहुल से बड़े होंगे पर वो खानदान सेवा की परंपरा को 'ढो' रहे हैं।
कांगरेस में कालूराम से लेकर राजो-महाराजों के वंशज काम करते हैं। कई का कद और व्यक्तित्व इतना बड़ा है-जिसके आगे पप्पू वाकई में पप्पू नजर आते हैं मगर वो ठहरे पार्टी सुप्रीमों। वो हैं तो पार्टी है। उनका परिवार हे तो पार्टी है लिहाजा हाथ बांध कर सिर झुकाकर खड़े रहना उनका कर्तव्यों ऊंची आवाज में बात करना गुनाह। ज्यादा चूं-चप्पड की तो या तो बाहर का रास्ता या फिर तड़ी। कई तो तड़ी पड़ चुकी है। राजों-महाराजें के वंशजों को पड़ी तडी उस की सबसे ताजा मिसाल। पिछले दिनों मध्यप्रदेश के दो दिग्गज नेते टिकट को लेकर एक-दूसरे के सामने हो गए थे। एक दिग्विजय सिंह और दूसरे ज्योतिरादित्य। दोनों नेते राजों-महाराजों के वंशज। बात हाथापाई तक पहुंच गई। हैरत की बात ये कि यह सब पार्टी सुप्रीमों राहुल गांधी के सामने हुआ। गरमा-गरमी के बीच उस दिन तो बैठक स्थगित कर दी गई बाद में राहुल ने दोनों को जोरदार तड़ी पिलाई। पहले दिग्गीराजा को  फटकारा फिर ज्योतिरादित्य को। इससे से दो बातें सामने आई। पार्टी में रहना है तो अनुशासन जरूरी है और दूसरी ये कि राजे हों या महाराजे। कांगरेस के बादशाह तो वही हैं जिन के आगे गांधी चस्पा है। 

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