तेइस का टोटका

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हमें ना तो किसी ओझे पे विश्वास ना किसी गुणिए पे। टोने-टोटकों से हजार कदम दूर। फिर भी रह-रह के वहम उपजता है कि तेइस की जगह इक्कीस या ग्यारह-इक्यावन होते तो कौन सी सफलता मिल जाती। यह भी हो सकता है कि भाई ने बाइस पार कर ली हो और तेइसवीं भारी पड़ गई हो। कुल जमा टोटका समझ से बाहर। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे। दुनिया की तो कह नहीं सकते, कारण ये कि हमने कभी दुनिया देखी नहीं। दुनिया भर में घूमें नहीं। अलबता दुनियाभर के बारे में देखा-सुना जरूर था। कई लोगों की अपनी दुनिया होती है। उनके लिए अमेरीका, फ्रंास, जापान, इंग्लैंड और चीन-पाक के कोई मायने नहीं रखते। उन का घर ही उन की दुनिया। उन का परिवार ही उन की दुनिया। उन का टोला-मोहल्ला ही उन की दुनिया। उन की गली-गुवाड़ी ही उन की दुनिया। उन की बीवी और आल-औलाद ही उन की दुनिया। कई लोगों का गांव ही उन की दुनिया तो कई लोगों का शहर ही उन की दुनिया। जब वो अपनी दुनिया से बाहर नहीं निकले तो वहां का हाल कैसे बता दें। वो अपनी दुनिया में मस्त। वो अपनी दुनिया में लगे हुए। सात समंदर पार क्या होता है। उन्हें नहीं पता। अलबता इतना जरूर जानते हैं कि भारत में ओझो-गुणियों और टोनों-टोटकों को मानने वालों की संख्या कम नहीं है। कहने को तो हम भले ही इक्कीसवीं सदी में विचरण कर रहे हो। हमने अंतरिक्ष में झंडे गाड दिए। समंदर में इतिहास रच डाला। पहाड़ों-पठारों पर नई इबारत लिख दी। इसके बावजूद अंधविश्वास की बेडिय़ों ने समाज  को जकड़ रखा है। लोग आज के वैज्ञानिक युग में भी टोनों-टोटकों पर विश्वास करते हैं। सयानों ने अंधविश्वासी ना बनने की सीख दी थी मगर लोग उस पर ही विश्वास करते जा रहे हैं। इस में उन का भी कोई दोष नहीं। हम पर लगा मुलम्मा पूरी तरह से हटा नहीं है। एक जमाने में भारत को ओझो गुणियों का देश कहा जाता था। अपनी पुरातन संस्कृति और ज्ञान के कारण हम विश्व गुरू थे पर ईष्र्या रखने वाले लोग भारत पर ओझों का देश होने का टेग टांगने से बाज नहीं आते। यह सही है कि भारत की हर क्षेत्र में धाक थी। उस धाक ने और पसराव किया मगर सच है कि आज भी हम अंधविश्वास में बंधे हुए हैं। सीबीआई, रॉ और सीआईडी के जमाने में भी नाखून पर काजल लगाकर चोरी-चकारी का आंखों देखा हाल देखने पे विश्वास कर बैठतें है। ऐसे कई लोग है जो अपने इल्म के बूते पर सब कुछ बताने का दम भरते हैं और लोग अंध विश्वास की आंधी में फंस कर उन के झांसे में आ जाते हैं। भूल जाते हैं कि 'काजलिए' चोरी-डकैती, हत्या-धाड़े का राज खोल देते तो खुफिया .....और सुरक्षा एजेंसियों पर करोड़ों-करोड़ रुपए सालाना क्यूं फूंके जाते। अंधविश्वासियों को यह बात समझ में नहीं आती। अपने यहां शगुन और अपशगुन की घटाएं भी छाती-बिखरती रही है। घर से निकलते समय बिल्ली रास्ता काट दें तो अपशगुन समझ लिया जाता है। सामने कोई दूध या आटा लेकर आ जाए तो अच्छा नहीं माना जाता। एक जाति विशेष का मानखा या मानखी सामने आ जाए तो दो मिनट रुक कर बाहर निकलते हैं। लोगों में यह अंध विश्वास घर कर गया है कि शुभ कार्य में छींक आ जाए तो उसे अच्छा नहीं माना जाता। इसी की पलट में हम-आप जैसे लोग भी है जो बिल्ला-बिल्ली के रास्ता काटने पर भी दन्नाटे के साथ घर से बाहर निकल जाते हैं। सामने से कोई दूध लेकर आ जाए या आटा। हम रुकने वाले नहीं। कोई छींके  तो छींके। छींकता रहे। वो नाक पौंछेगा जित्ते में हम गली के बाहर निकल जाएंगे। आज तक तो कुछ नहीं हुआ। थोड़ा बहुत ऊंच-नीच हो जाए तो उस का आटे-दूध या छींक से कोई रिश्ता नहीं। गाड़ी स्टार्ट इसलिए नहीं हुई कि टंकी में पेट्रोल नहीं था। कोई इसे छींक से जोड़ ले तो इस में किसी का क्या कसूर। इस में छींक का क्या दोष। इसी प्रकार संख्या को लेकर भी राग शगुन-अपशगुन गाए जाने की रीत पुरानी है। एकी को सु_ा और बेकी को सु_ा नहीं माना जाता। एकी बोले तो एक और बेकी बोले तो दो। एकी में एक-तीन-पांच-सात-नौ-ग्यारह-तेरह-पंद्रह-सतरह-उन्नीस और इक्कीस आदि। तिस में तीन-तेरह-तेरस को सु_ा नहीं माना जाता और बेकी में दो-चार-छह-आठ-दस-बारह। पर हथाईबाज जिस टोटके की बात कर रहे हैं उस के तार तेइस से जुड़े हुए। पिछले दिनों जोधपुर जेल में मिलनी करने आए एक युवक के पास से स्मेक की तेइस पुडि़ए बरामद की गई। ये पुडि़एं उस ने जूतों के तलवे में छुपा के रखी थी। वह जेल में बंद अपने एक मित्र से मिलने आया था। तलाशी के दौरान पकड़ा गया।  अब सवाल ये कि तेइस का टोटका क्या है। उसे पुडि़ए लानी थी तो दो-चार ले जाता। चार-छह, आठ-दस ले आता। एकी पे विश्वास करता तो पांच-सात पुडि़एं रख लेता। नौ-ग्यारह जुटा लेता। उन्नीस-इक्कीस का शगुन बढिय़ा था। तेइस का टोटका कुछ जचा नहीं। शायद इसी वजह से पकड़ा गया। कुल जमा तेइस का टोटका रास नहीं आया।

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