बीस प्लॉटों वाला

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शीर्षक के मायने अपने-अपने अंदाज में निकाले जा सकते हैं। जिस की जो समझ में आए उसके अर्थ से तार जोड़ सकता हैं। कोई चाहे तो-'वाला' से पहचान दे सकता है और कोई चाहे तो-'नौकरी' के मुजब। टोले-मोहल्ले में ऐसा अक्सर होता है। कुछ लोगों की पहचान उनके पेशे और कुछ की शिनाख्त गांव-क्षेत्र से की जाती है। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे। वाला का टोला-मौहल्ला विशाल है। विस्तृत है। अनंत है। एक्यूरेट-नाप-तोल तो कभी किया नहीं। ना कोई ऐसा कर सकता है। अपने यहां एक से बढ कर एक-आले से आले इंजीनियर्स हुए। एक जमाना वो भी था तब शिक्षा का इतना प्रचार-प्रसार कहां था। पाली तक पढे-लिखे लोग भी बिरले मिलते। महिला शिक्षा का तो अतापता भी नहीं। इंजीनियरिंग-मेडिकल तो दूर कला-वाणिज्य और विज्ञान संकाय के पतियारे नही थे। आज के इंजीनियर्स जो काम करते हैं वो उस बखत के गजधर और कारीगर-कामगार किया करते थे मगर उनकी कला और कलाकारी-इंजीनियर्स से दस कदम आगे। उस जमाने में बने किले-हवेलिया और माळिए आज भी आन-बान और शान से तने हुए हैं जब कि डिग्रीधारियों द्वारा बनाई गई इमारतें-पुल पांच-दस साल में भरभरा जाते हैं। कई पुल तो बनने के साल दो साल बाद ही तिड़क गए। उस जमाने के कामगार-गजधर हों या ओवरसियर-इंजीनियर्स उन सब को नाप-तोल पे  लगा दिया जाए तो भी 'वाला' की वॉल नपने वाली नहीं। नाप-तोल में इन लोगों का जिक्र इसलिए किया कि इसमें इस जमात की मास्टरी है। पक्की है या कच्ची यह बाद की बात। पक्की है तो कित्ती और कच्ची है तो कित्ती इस लफड़े में अपन को नहीं पडऩे का। नहीं है तो भी मानना पड़ेगा कि वो इस मामले के विशेषज्ञ है वरना दीगर नाप-तोल वाले भी है। दरजी कपड़ों का नाप लेता है। बुशर्ट का नाप अलग-पेंट का अलग। शूट हो तो कोट-पेंट और कोटी का अपना नाप। कपड़े रेडिमेड लिए जाएं तो भी नाप के अनुसार खरीदे जाते हैं। कद-काठी और पसंद के हिसाब से कपड़ों का चयन किया जाता है। लंबाई का नाप अलग-कमर का नाप अलग। शर्ट हो तो उसका अपना हिसाब-किताब। वस्त्र अगर थान में से कटवाने हो तो उसका नाप अलग होता है। किसी का बुशर्ट दो मीटर कपड़े में बनता है- किसी का ढाई मीटर में। पूरी बाहों के शर्ट का नाप अलग-आधी बाहों वाले बुस्केट के लिए कपड़ा अलग। नापने को भतेरी चीजें हैं। लंबाई-चौड़ाई के साथ-साथ गहराई भी मापी जाती है। थर्मामीटर से बुखार नापा जाता है। दूरी नापी जाती है। गलतफहमी पालने वाले लोग सामने वाले की औकाद नापते हैं। हम-आप का मानना है कि ऐसा करना गलत है, पर जो लोग इसे सही मानते हैं उनका कोई इलाज नहीं। झटका लगने पर एहसास होता है कि वैसा नहीं करना चाहिए तब तक देर हो सकती है। इसी प्रकार 'वाला' का कुनबा भी मतवाला है। यूं कहें कि इस में पूरी कायनात शामिल है, तो भी गलत नहीं। कई तो 'वाले' हैं हीं-बाकी के आगे लगा द्यो तो आन-बान और शान बढ जाती है। अगर एक-एक 'वाले' को गिनाने बैठ जाएं तो कलैंडर्स बदल जाएंगे लेकिन खास-खास को नजर अंदाज करना ठीक नहीं होगा। उन पर एक नजर डालों तो भी एकाध साल लग ही जाणा है। कई 'वालों' के बिना तो काफी कुछ सूना-सूना लगता है। दिलवालों के दुनिया और डिब्बे वालों के बिना मुंबई। इस बीच वाले ही वाले। कई तो जिंदगी के हिस्से बन गए। एक-दो दिन दीदार ना हों तो बड़ा अटपटा लगता है। दूध वाला और अखबार वाला उन में शुमार। साक-भाजी वाला उनमें सम्मिलित। डिस्क वाले से लेकर भंगार लेने वाले हम-आप से जुड़े हुए। दवाईवाला-नमकीन वाला-मिठाई वाला-सफाई वाला। चाय वाले ने तो इतिहास बदल के रख दिया। बरसों से देश पर कुंडली मार कर बैठे परिवार को हांशिए पे डाल दिया। आज हालात ये कि अम्मा जमानत पर। पुतर जमानत पर। जमाई राजा जमानत पर। जिन पर आज तक किसी के हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटाई। चायवाले ने बता दिया कि कानून सब के लिए बरोबिट्ट है। पर हथाईबाज जिस 'वाले' की बात कर रहे हैं वो उस की पहचान साबित करने वालों की सूची में। गली-गुवाड़ी में कई लोगों की पहचान उन के काम-धंधे से होती है। नेमजी कौन से, चक्की वाले। नासीर भाई कौन से, साइकिल वाले। भगवान जी कौन से, रेलवे वाले।  इसी प्रकार कॉलोनियों और पॉश इलाकों में लोगों की पहचान निवास स्थान के नंबर से होती है। पांच नंबर वाली आंटी। दस नंबर वाले अंकल। उसी तर्ज पर बीस प्लॉटों वाला ग्राम सचिव। सचिव पद और बीस भूखंड वाला पहचान। एसीबी ने रामगंजमडी कोटा के सातलखेड़ी क्षेत्र में कार्यरत ग्राम सचिव को 25 हजार की घूस लेते गिरफ्तार किया। जांच हुई तो सचिव किरोड़ी निकला। वो लाखों की नकदी वाला। वो कार वाला। वो सात मकानों वाला। वो बीस भूखंडों वाला। घूसखोर ग्राम सचिव बीस भूखंड वाला हो सकता है तो घूसखोर संसदीय सचिव कितने भूखंड वाला होगा। सवाल दागने वालों ने दाग दिए-जवाब का इंतजार। 

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