ज्यां घट बहुळी बुध बसै

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ज्यां घट बहुळी बुध बसै, रीत-नीत परिणाम।
घड़ भांजै, भांजै घडै़ सकळ सुधारै काम।।

जिनके भीतर रीति-नीति के परिणाम वाली बुद्धि बहुतायत से रहती हो वे किसी न किसी तरह अपने बिगड़े हुए सभी काम सुधार ही लेते हैं। सच को उजागर कर ही लेते हैं। (गतांक से आगे) राजाजी ने सेठ को अपने बराबर बैठाया। फोगसी को ऊंचा आसन दिया और कहा कि फोगसीजी, मेरा परसों सांझ को पेट दुखना शुरू हुआ, जो ऐसा दुखा कि मैं मरते-मरते बचा। बेचारे वैद्य हकीमों ने रात भर भागा दौड़ी की, कल जाकर पीड़ा कम हुई तब कल दरबार में आकर बैठा। इतने में ही यह सेठजी, जिनकों में चेहरे से भी नहीं जानता, आए और बोले कि आप कल सांझ को  जो मोहरे लाए थे, वे हजार मोहरें मुझे वापिस दीजिए। मैंने कहा कि मैं तुम्हारी मोहरें नहीं लाया, कोई दूसरा ले गया होगा। लेकिन सेठजी कहते हैं कि मोहरें तो आप ही लाए थे। बताइए, अब मैं मोहरें कहां से दूं? इस विवाद को सुलझाने के लिए फोगसीजी मैंने आपको तकलीफ दी है। अब आप जल्दी से न्याय कर दीजिए। मुझे अपने रोग की बड़ी चिंता लगी हुई है। मामला सुलझ जाए तो सुख की नींद लूं। फोगसी ने सोचा कि मामला राजाजी का है, इसलिए न्याय तो अच्छी तरह करना पडेगा। फोगसी ने राजाजी को सेठ को, दरबारियों को और शहर के लोगों को एकांत में बुला बुला कर पूछना शुरू किया। राजाजी का पेट दुखना तो सभी ने बताया, लेकिन मोहरों के बारे में एक बनिये ने ही बताया। औषधि उपचारों के बारे में वैद्य  हकीमों बताया, लेकिन घोड़े पर चढकर शाम को सैर करने वाली बात किसी ने नहीं बताई। कहीं आधी मिली कहीं पूरी मिली और कहीं मिली ही नहीं। लेकिन फोगसी को थोड़ा मार्ग मिल ही गया। तब राजाजी और सेठ दोनों को अपने पास बुलाया और कहा कि मैं पक्ष विपक्ष मान मर्यादा बिना होगी जैसी सच्ची बात कहूंगा। लेकिन जो न्याय मैं करूंगा, वह आप दोनों को मानना पड़ेगा। दोनों बोले कि मानेंगे। तब फोगसी ने कहा कि तो आप जल्दी से सूरज अस्त हो चुका है। आप भोजन करके वापिस आ जाइए मैं निर्णय सुनाता हूं। तब राजाजी बोले कि फोगसीजी, मैं तो मेरे महल में अभी भोजन करके आ जाऊंगा और आपके लिए भी थाल भिजवा दूंगा, लेकिन सेठजी का घर यहां से बहुत दूर है। सेठ जी भोजन करके आएंगे, इतने में तो आधी रात ढल जाएगी। इतनी रात गये मैं बीमार जागता नहीं रह सकता। सेठ को यहीं भोजन करा दीजिए और न्याय कर दीजिए। तब फोगसी ने कहा कि आप सेठ की हजार सोने की मोहरें ले आइए। राजाजी बोले कि क्यों? फोगसी ने कहा कि आप सेठजी ने घर की दूरी जानते हैं इसलिए। राजाजी की बोलती बंद हो गई। उन्होंने मोहरें लाकर  सेठ को दे दी। सेठ बड़ा प्रसन्न हुआ। राजाजी आखिर मान गए कि फोगसी तो वाकई फोगसी है।

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