जोबन आवै जोर

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दौलत सूं दौलत बधै, दुनिया आवै दौर।
जस होवै सब जगत में, जोबन आवै जोर।।

धन से धन में वृद्धि होती है। धन के कारण दुनिया दौड़ती हुई पास आती है। धन से संसार में यश फैलता है और धन होने पर यौवन में जोश भर जाता है। इसलिए धन की बड़ी महिमा है। एक मढी में एक साधु रहता था। वह उससे उस साधु के पास कोई दूसरा साधु आया। वह उससे मिलने के लिए आया था। रात को जब दोनों खा पीकर सो गए तो आने वाले साधु ने कोई बात कहनी शुरू की। लेकिन मढी वाला साधु उसकी बात ध्यान से नहीं सुन रहा था। बात यह थी कि उसने सवेरे के खाने के लिए कुछ रोटियां बांधकर खूंटी पर लटका रखी थी और एक चुहिया उछल उछल कर रोटियों तक पहुंचाना चाहती थी। साधु अपने डंडे से उसे बार बार भगा रहा था। आगंतुक साधु को उसकी उपेक्षा अच्छी न लगी। लेकिन उस जब उपेक्षा का कारण जान पड़ा तो उसने कहा कि इस चुहिया का बिल खोदना चाहिए, अवश्य ही बिल में कुछ धन गड़ा हुआ है, जिसके बल पर यह कूद रही है। बिल खोदा गया तो उसमें कुछ सोने के गहने मिले। तब आगंतुक साधु ने कहा कि तुम निश्चिंत हो जाओ, अब वह चुहिया कदापि रोटियों तक नहीं पहुंच सकेगी, जिस धन के बल पर वह कूद रही थी, वह हमने निकाल लिया है। एक मंदिर में एक अंधा पुजारी पूजा किया करता था। मंदिर में विशेष आय न थी। पुजारी अपने लिए जो रोटियां बनाता, उन्हें ही भगवान के आगे रख कर स्वयं खा लेता। मंदिर में एक बड़ा बिलाव आने लग गया था। सो ज्यों ही अंधा भगवान के आगे रोटियां रखकर हाथ जोड़ता, त्यों ही बिलाव रोटियां उठाकर भाग जाता पुजारी हैरान हो गया, आखिर उसने एक तरकीब निकाली कि रोटियां रखकर उनमें एक काठ की खूंटी गाड़ दिया करता, जिससे कि बिलाव उन्हें उठाकर नहीं भाग सके। तभी से उस मंदिर में यह प्रथा पड़ गई कि भगवान के जो भोग लगाया जाए, उसमें खूंटी अवश्य गाड़ी जाए। उस पुजारी की मृत्यु के बाद जब दूसरा पुजारी आया तो उसने भी प्रथा के अनुसार रोटियों मेें खूंटी गाडऩा शुरू कर दिया। फिर तीसरा पुजारी आया, वह कुछ समझदार था। उसने बड़े-बूढों से पूछा कि यह क्या प्रथा है? तब किसी जानकार बूढे ने उसे बतलाया कि यह प्रथा किसलिए चली। तब उसने कहा कि वे बाबाजी तो अंधे थे, अत: वे ऐसा करते थे। लेकिन मेरे तो मुंह पर आंखे हैं, मैं भला लकीर का फकीर क्यों बनूं? और उसने उसी दिन से उस प्रथा को तोड़ दिया। 

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