लिछमी जाणै आपणी

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लिछमी जाणै आपणी, कदै न अपणी होय।
घिरत-फिरत की छांहड़ी, जाणत है सब कोय।।

लोग समझते हैं कि लक्ष्मी तो अपनी है, लेकिन लक्ष्मी कभी अपनी नहीं होती। वह तो चंचल छाया के समान हैं, आज यहां तो कल वहां, यह बात सभी जानते भी हैं। एक सेठ बहुत मालदार था। एक दिन सेठ को लक्ष्मी सपने में दिखलाई दी और उसने सेठ से लक्ष्मी से प्रार्थना की कि तुम मेरे यहां अधिक नहीं तो छह महीने और ठहर जाओ। लक्ष्मी ने सेठ की बात मानकर उसके यहां छह मास और रहना स्वीकार कर लिया। सेठ ने हरद्वार में नदी किनारे एक हवेली बनवाई और अपने सारे धन को जवाहररातों में बदल जवाहरातों को लकड़ी के शहतीरों में भरवा दिया और फिर उन शहतीरों को हवेली में लगवा दिया। अब सेठ निश्चिंत हो गया कि मेरा धन नहीं जा सकता। लेकिन छह महीने पूरे होने पर सेठ को फिर सपने में लक्ष्मी दिखलाई दी और उसने सेठ से कहा कि तुम्हारी मांग पूरी हो गई है, अब मैं तुम्हारे यहा से जाती हूं। मैं तुम्हारे यहां अमुक हलवाई के यहां जाऊंगी। दूसरे ही दिन वर्षा के साथ बड़ा भयंकर तूफान आया। गंगा का पानी बहुत दूर तक फैल गया। सेठ का मकान गिर गया और जवाहररातों से भरे शहतीर गंगा में बह चले। सेठ शहतीरों के पीछे पीछे दौड़ा। शहतीर बहते बहते किनारे लगे और मछुओं ने शहतीरों को बाहर निकाल लिया। वहीं उक्त हलवाई ने अपनी दुकान खोल रखी थी। मछुओं ने वे शहतीर हलवाई को बेच दिए। पीछे पीछे सेठ आया और उसने हलवाई से आदि से अंत तक की सारी घटना सुनाई। सेठ की बात सुनकर हलवाई बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने सेठ से कहा कि मैं आधा धन तुमको दे दूंगा। लेकिन सेठ ने उतर दिया कि अब यह धन मेरे पास नहीं रहेगा, यदि रहता तो जाता ही क्यों। हलवाई सेठ को भोजन कराने के लिए अपने घर ले गया। सेठ ने भोजन करवाया और राह में खाने के लिए चार लडडू भी दिए। सेठ लडडू लेकर अपने घर को चला। नदी पार करने के लिए उसने एक नाव किराये पर ली और घर पहुंचा। सेठ ने देखा कि वहां तो कुछ भी नहीं रह गया है। सेठ के पास नाविक को देने के लिए पैसे नहीं थे, अत: उसने चारों लडडू मजदूरी स्वरूप नाविक को दे दिए। नाविकों ने सोचा कि लडडू खाकर क्या होगा। यदि इन लडडुओं को बेचकर अनाज ले जाएं तो सारे बाल बच्चों का पेट भर जाएगा। यों सोचकर उन्होंने चारों लडडू लाकर उसी हलवाई को दे दिए और बदले में अनाज ले गए। हलवाई ने उन लडडुओं में चार रत्न सेठ के लिए छिपाए थे। जब वे वापस उसके पास आ गए तो उसने सोचा कि यह लक्ष्मी मेरे भाग्य में ही लिखी है, इसे दूसरा कौन ले सकता हैं?

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