धूरत लक्षण माल

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मुख दीसै विगस्यो कमळ, चंदन वचन रसाला।
हिवड़े जाणै कतरणी, धूरत लच्छण माल।।

जिसका मुंह खिले हुए कमल के समान दिखता है, जिसके वचन चंदन के समान शीतल और आम के समान मीठे हो, लेकिन हृदय में जैसे कर्तनी हो तो ये लक्षण धूर्त के होते हैं। एक नाई के पास एक भैंस थी, जिसे वह रोज पोखर पर ले जाकर स्नान करवाता था। एक दिन जब वह उसे मल-मल कर नहला रहा था तो उसने देखा कि किनारे पर एक बाबाजी ने तीस अशर्फियां बटुए में रखी और उसे अपने जटा-जूट में छिपाकर बांध लिया। जल्दी से नाई घर आया और अपनी भैंस बांधकर वह बाबाजी के पास पहुंचा। बाबाजी को दंडवत् प्रणाम करके उसने कहा कि बाबाजी, आज शाम को मुझ गरीब के घर आपके चरण पड़े तो मैं निहाल हो जाऊं। अब तक मुझे कोई गुरू नहीं मिला है, सो मुझे शिष्य बनाकर मेरा चोला सफल कीजिए। बाबाजी बोले कि बच्चा, अगर तुम दक्षिणा में दो अशर्फियां देने को तैयार हो तो तुझे अपना शिष्य बना सकता हूं। नाई बहुत नरमाई के साथ बोल कि बाबा, मुझे मंजूर है। आपके चरण-कमल की दया होगी तो दो अशर्फिया कौन बड़ी बात है। इतना कहकर बाबाजी का झोला अपने कंधे पर डाला और चल दिया। बाबाजी खड़ाऊ की खट-खट करते हुए उसके पीछे चले। घर पहुंचने पर नाई और नाइन ने बड़ी भील से बाबा के पैर थाली में रखकर धोए। भोजन में भोजन को वहीं सुलाया गया। सुबह जब बाबा चलने लगे तो उन्होंने अपनी दक्षिण मांगी। नाई ने नाइन को संदूक की चाबी देते हुए कहा कि संदूक में तीस अशर्फिया रखी हुई है। जा, उनमें से दो लाकर गुरू महाराज को दे दे। नाइन चाबी लेकर गई और संदूक खोला, पर चारों ओर ढंूढने पर भी अशर्फियां नहीं मिली। उसने आकर यह बात कह दी। तब नाई बोला कि यह तेरी करतूत है। मौका मिलने पर तूने अपने भाई को दे देगी। इसलिए तेरी तलाशी दे दीजिए, जिससे इसका शक मिट जाए। बाबाजी पहले  तो हिचकिचाए, पर कर क्या सकते थे। तलाशी लेने पर उनके जटा जूट में बटुआ सहित अशर्फियां मिल गई। नाई बोला कि देखा, महाराज में कितना सत्त है। खोयी हुई अशर्फियां इन्होंने वापस बुला ली। और उन तीस अशर्फियों में से दो अशर्फियां बाबाजी के चरणों में रख दी। नाई ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि फिर कभी इधर पधारें, सेवक को मत भूलिएगा। अपना हारा और स्त्री का मारा आदमी कुछ नहीं बोलता सो बाबा चुप रहे और फिर वहां से चल दिए।

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