अणहोगी होवै नहीं

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क्रोड़ सयाणप लाख बुध, कर देखौ से कोय।
अणहोणी होवै नहीं, होणी हो सो होय।।

कोई क्या, सब अपनी करोड़ चतुराई और लाख बुद्धि लगाकर देख ले, दुनिया में कभी अनहोनी नहीं होती है, होनी होती है और होनी जब होनी ही है तो वह हो। एक सेठ भगवान का पक्का भक्त था। उसने प्रण कर रखा था कि रोज चार साधुओं को भोजन करा के स्वयं भोजन करूंगा। इस प्रण को सेठ बहुत दिनों तक निभाता रहा, लेकिन एक बार तीन दिनों तक कोई साधु नहीं मिला। सेठ तीन दिनों तक भूखा रहा। चौथे दिन सेठानी बोली कि यह क्या बात हुई। यों तो रोज भूखों मरते जाएंगे। आप तो हलवाई की दुकान जाकर खांड के साधु बनवा लाइए और फिर उनके दर्शन करा करे। सेठ को पहले तो यह बात जंची नहीं, लेकिन अब भूख के मारे प्राण गले में आने लगे तो हलवाई से चार साधु खांड के बनवा लाएं। अब उनेक दर्शन कर सेठ भोजन करने लगा। एक दिन खांड के उन साधुओं को सेठ के छोटे बेटे ने देख लिया। उसने हठ किया कि बापू, मैं तो साधु खाऊंगा। तब सेठ ने बड़ी मुश्किल से उसको भुलाया कि मैं नहीं खा रहा हूं, अपन दोनों साथ ही मिलकर खाएंगे। इसके बाद सेठ नहाने के लिए तालाब पर गया। आगे देखा तो तालाब पर चार साधु विश्राम कर रहे थे। सेठ की प्रसन्नता का पार नहीं रहा। कई दिनों बाद साधु जो मिले थे। सेठ तुरंत उनके समीप पहुंचा और उनसे बोला कि आप मेरे घर पधारकर घर को पवित्र कीजिए। साधुओं को भोजन तो करना ही था, अत: वे सेठ के साथ हो लिए। सेठ उनको लेकर अपने घर पहुंचा और एक दरी बिछाकर उनको बिठाया। फिर नहाने के लिए वापस तालाब पर पहुंचा। सेठ के घर के भीतर लड़का हठ कर रहा था। वह मां से बोला कि मां, मैं तो साधु को खाऊंगा। रोटी बनाती हुई मां उसको कर रही थी कि तेरे बापू का आ जाने दे, तब सब साथ ही खाएंगे। लेकिन लड़का जोर देने लगा कि मैं तो अभी खाऊंगा। साधुओं ने सुना तो सोचा कि यह कैसा सेठ है? यह तो किसी राक्षस का घर है। और वे तुरंत अपने दंड कमंडल लेकर वहां से चल पड़े। उधर तालाब पर नहाकर सेठ लौट रहा था। उसने उन साधुओं को जाते देखा तो वह उनके पीछे भागा कि महाराज, ऐसे कैसे जा रहे हैं? साधुओं ने सोचा कि इसके हत्थे चढ गए तो आज मौत निश्चित है। यह सोच वे जंगल की तरफ दौड़े। पीछे-पीछे दौड़ता हुआ सेठ ने पुकार कहा कि महाराज, आप बिना भोजन करे मत जाइए, मैं भूखा रह जाऊंगा। दौड़ते-दौड़ते साधु बोले कि तू किसी और को खा लेना, हम तो चले। 

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