न्यू इंडिया 2022ः जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से लड़ने की तैयारी

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अगस्त 2018 में, दक्षिण भारतीय राज्य केरल ने लगभग एक सदी में अपनी सबसे खराब बाढ़ का अनुभव किया। अप्रैल 2019 में, ओडिशा 40 वर्षों में भारत के सबसे मजबूत ग्रीष्मकालीन चक्रवात ‘वायु’ का गवाह बना। कैलिफोर्निया में, पैसिफिक गैस एंड इलेक्ट्रिक कंपनी के पतन के साथ, दुनिया में पहली बार कोई कंपनी जलवायु-परिवर्तन के चलते दिवालियापन का शिकार हुई। तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे थामे रखने में असमर्थता के चलते एक अनुमान के मुताबिक वैश्विक स्तर पर 69 ट्रिलियन यूएस डालर का आर्थिक नुकसान हो सकता है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, कि वैश्विक व्यापार जगत के नेताओं के हालिया विश्व आर्थिक मंच सर्वेक्षण में 2019 में अर्थव्यवस्थाओं के लिए सबसे बड़े वैश्विक जोखिमों में से दो के रूप में चरम मौसम और जलवायु परिवर्तन को सूचीबद्ध किया है। जलवायु परिवर्तन हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है जो सरकारों, कॉरपोरेट और समुदायों को 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था के प्रतिमानों को मौलिक रूप से फिर से परिभाषित करने का आह्वान करती है। भारत सरकार अपने महत्वाकांक्षी जलवायु प्रतिबद्धताओं के तहत इन चुनौतियों का जवाब देते हुए दशकों पुरानी जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम कर अपनी उत्सर्जन तीव्रता घटा रही है। इन प्रतिबद्धताओं को प्राप्त करने के लिए, सरकार ने जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की है, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) का नेतृत्व किया और ई-मोबिलिटी के लिए फेम और ऊर्जा-दक्षता के लिए उजाला योजना जैसी महत्वपूर्ण पहल की। विश्व पर्यावरण दिवस 2018 पर, संयुक्त राष्ट्र के बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन कैम्पेन के साथ खुद को जोड़ते हुए भारत सरकार ने भी 2022 तक हर तरह के एकल-उपयोग प्लास्टिक को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध किया। प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों, 2018 के तहत एक्स्टेंडेड प्रोड्यूसर रेस्पॉन्सबिलिटी (ईपीआर) ढांचे के तहत कार्यान्वयन ने प्लास्टिक निर्माताओं को जोड़ते हुए इसमें मदद की है, जिसके परिणामस्वरूप जवाबदेही बढ़ जाती है। जहां नया जनादेश 2022 तक न्यू इंडिया के निर्माण के लिए सरकार के दृष्टिकोण को फिर से मजबूत करेंगे, निजी क्षेत्र की भागीदारी को सक्षम करने वाली उद्देश्य नीतियां भारत को कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था में संक्रमण को और तेज करेंगी। सरकार के नीतिगत रोडमैप तैयार करते ही भारत के 2030 जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक 2.5 ट्रिलियन यूएस डॉलर जुटाने में वित्तीय संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। पिछले एक दशक से, मुख्य तौर पर ग्रीन फाइनेंस की अगुवाई बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा (आरई) परियोजनायों ने की है, जिनसे इस अप्रैल में अक्षय क्षमता के 80.28 गीगावॉट की संचयी उपलब्धि हुई। निवेश की अगली बड़ी संभावना छोटे पैमाने पर और उन परियोजनाओं में निहित है जो ग्रामीण समुदायों के करीब हैं। कमजोर और सीमित क्रेडिट इतिहास के कारण ऑफ-ग्रिड और रूफटॉप सोलर जैसे एसेट्स को अक्सर मुख्यधारा के वित्त तक पहुंच नहीं मिलती है। पूंजी बाजार से वित्त का उपयोग करने के लिए ऋण संवर्धन द्वारा एकत्रीकरण और प्रतिभूतिकरण जैसे संरचित तंत्र का लाभ उठाया जा सकता है। ग्रीन बॉन्ड जैसे तंत्र आगे चलकर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की ओर लंबे समय तक निवेश करने में मदद करते हैं। रोलिंग स्टॉक और बुनियादी ढांचे में कम कार्बन सुधार की एक श्रृंखला के वित्तपोषण के लिए इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन द्वारा दिसंबर 2017 में लंदन स्टॉक एक्सचेंज से 500 मिलियन अमरीकी डालर जुटाकर इसका सबूत दिया गया है। ऐसी नवाचारी ढांचे का उपयोग करने से 2022 तक 175 गीगावाट अक्षय ऊर्जा क्षमता तैयार करने जैसी जलवायु कार्रवाई प्रतिबद्धता को पूरा करने में भारत को मदद मिलेगी, जिसमें 40 गीगावाट का हिस्सा रूफटॉप सोलर का है। यह देखा गया है कि ग्रीन बांड न केवल निवेशकों के लिए आकर्षक साबित हुए हैं, बल्कि इससे काफी सकारात्मक पर्यावरणीय प्रभाव पैदा करने में भी मदद मिली है। आज निवेशकों की बढ़ती संख्या एनवायरमेंट, सोशल एंड गवर्नेंस (ईएसजी) डेटा की मांग कर रही है, जो कि वित्तीय संस्थानों को अपनी व्यापार रणनीतियों में न केवल सस्टेनेबिलिटी बनाए रखने के लिए प्रवृत्त करती है, बल्कि नए ग्रीन प्रोडक्ट को भी विकसित करती है।
नवीन मिश्रित वित्त मॉडल वित्तीय संस्थानों को छोटे पैमाने पर वितरित परियोजनाओं के लिए वित्त बढ़ाने और जुटाने के लिए अन्य अप्रयुक्त रास्ते तक पहुंच प्रदान करते हैं। इस तरह के उपकरण जल, अपशिष्ट प्रबंधन और जलवायु-स्मार्ट कृषि जैसे क्षेत्रों में निवेश के जोखिमों और निजी पूंजी में भीड़ को कम करने में कारगर साबित होंगे। 2013 कंपनी अधिनियम ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) को निजी क्षेत्र के लिए एक और रणनीतिक उपकरण के रूप में उभरने में मदद की है, जो सतत विकास लक्ष्यों के लिए आवश्यक धनराशि का निर्देशन करता है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए सीएसआर अनुदान का उपयोग करते हुए, यस बैंक ने अपनी तरह की नई  पहल ‘से यस टु सस्टेनेबल एमएसमई इन इंडिया’ विकसित की। 2015 में अपनी स्थापना के बाद से, कार्यक्रम ने लगभग 50,000 एमएसएमई में पर्यावरणीय स्थिरता, व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को बढ़ावा देने में मदद की है, लगभग 90,000 कामगारों को प्रभावित किया है और सालाना 13,500 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने का अनुमान है। जलवायु परिवर्तन से दुनिया में काफी बदलाव आ रहे हैं और सामान्य तरीके से व्यापार करने की बजाय व्यवयास के भीतर नयापन लाने पर जोर है। दुनिया जलवायु संकट, अनुकूलित नीति निर्धारण, सार्वजनिक और निजी दोनों संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी, नवीन वित्तपोषण तंत्र और उन्नत सहयोग चाहती है, जो न्यू इंडिया को कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था में तेजी से ले जाएगा।

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