अफवाहों से सावधान

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ठीक नहीं है भाई, बिल्कुल ठीक नहीं है। पहले जो कुछ हुआ था, उसे भी उचित नहीं माना गया। इन दिनों जो हो रहा है  वह भी उसी श्रेणी में आता है। साफ शब्दों में कहे तो दोनों श्रेणियां घिनौनी। ऐसा करने का अधिकार किसी ने किसी को नहीं दिया। कानून हाथ में लेने का हक किसी के पास नहीं। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे। पहले जो हुआ अथवा मौजूदा समय में जो कुछ हो रहा है उनमें ''ठीक नहीं है" का पलड़ा भारी है। ऐसा नहीं कि सब कुछ खराब ही हुआ था, सब कुछ खराब ही होगा। कई बातें अच्छी भी हुई। अच्छी से अच्छी  भी हुई। बात ''ठीक नहीं है" की चल रही है तो पटरी से काहे को उतरना। पटरी से उतरने को अच्छा संकेत नहीं माना जाता। रेल पटरी से उतर जाती है तो क्या से क्या हो जाता है। पटरियों से उतरी टे्रन ने कई परिवारों के चिराग बुझा दिए। कई की मांग का सिंदूर उजाड़ दिया। कई की राखी सूनी हो गई। कई आंगन की किलकारियों को सिसकियों में बदल दिया। कोई गलत रास्ता पकड़ ले तो उसे गलत लाइन अथवा गलत पटरी पर जाने से जोड़ा जाता है। इसके माने ये नहीं कि हथाईबाज पटरी से उतरने का प्रयास कर रहे हैं। वरन ये कि जिस पर पत्रवाचन करना है उसी पे किया जाए तो ठीक रहेगा। पिछले दिनों से कई बातें ऐसी हो रही हैं जो देश और समाज की सेहत के लिए अच्छी नहीं कहीं जा सकती। सेहत समाज की बिगड़े या व्यक्ति की, ठीक नहीं है। बीमारी से किसी की सेहत बिगड़ जाए तो पूरा कुनबा परेशां हो जाता है। पिछले बरसों से सरकारी स्कूलों में बच्चों को दोपहर का भोजन खिलाने की योजना चल रही है। इस महिने से दूध पिलाओं योजना भी शुरू कर दी गई। हफ्ते में तीन दिन दूध और सोम से शनिवार तक रोटी भी। इस के पीछे तर्क ये कि बच्चों की सेहत बनेगी। बच्चे स्वस्थ तो देश स्वस्थ। बच्चे गोलू-गोलू तो देश गोलू-गोलू। एक बात और। बीमार पडऩे पर दवा-दारू  करके इलाज करवा लिया जाता है। विचारों की सेहत गड़बड़ा जाए तो गर्त में गिरने की पूरी आशंका। देश में महंगाई बढ़ रही है। ठीक नहीं है। जो लोग पेट्रोल के दाम 40-45 रूपए प्रति लीटर पहुंच जाने पर सड़क से लेकर सदन में संग्राम मचाया करते थे आज उन्हीं के राज में तेल आम आदमी का तेल निकाल रहा है और वो जुमलेबाजी से बाज नहीं आ रहे। देश में मासूम बच्चियों से दुष्कर्म और दुष्कर्म के बाद हत्याएं हो रही है। घिनौनी है। नवरात्रों में हम बच्चियों को मां का दर्जा देकर पूजते हैं, कमीने लोग उन बच्चियों के साथ मुंह काला करने से नहीं चूक रहे। नीचों को सजा-ए-मौत का भी खौफ नहीं। माना कि केन्द्र सरकार के किसी मुनीम गुमास्ते पर भ्रष्टाचार के आरोप ना लगे हों, पर निचला तबका तक अभी भी उसी में रमा हुआ है। यह ठीक नहीं है। शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। शिक्षण संस्थान सियासी और असामाजिक तत्वों के अड्डे बनते जा रहे हैंं। यह ठीक नहीं है। पर हथाईबाज जिस ठीक नहीं है की चर्चा कर रहे हैं उस के  तार ठुकाई-पिटाई से जुड़े हुए। हमें बचपने में माटसाब की तड़ी से हुई-ठुकाई-सुड़ाई आज भी याद है। उसी तड़ी की किरपा से हम खाने-कमाने लायक बने। बच्चे आपस में ठुकाई-पिटाई करते हैं। पांडु पुलिस को लगता है इस का प्रशिक्षण टे्रनिंग के दौरान ही दे दिया जाता है। सड़क छाप दिवानों की चप्पल-सेंडिलों से ठुकाई-पिटाई होती रही है। गुटों-गैंग में सरेआम ठोकाठोकी होती रही है। ये सब ठीक नहीं है। इन दिनों जो हो रहा है वह तो इतना घटिया-इतना घिनौना कि ''ठीक नहीं भी जमीन में गढ़ जाए। पिछले दिनों से देश के विभिन्न क्षेत्रों से बच्चा चोरी के नाम पे ठुकाई-पिटाई की खबरे आ रही है। अफवाहों के कारण बच्चें चोरी के नाम पर दो दर्जन लोगों की हत्या हो चुकी है। अफवाहबाज मोबाइल के जरिए अफवाह फैला रहे है और छोटे दिमाग वाले उस की चपेट में आ कर आपा खो देते हैं। नतीजा हत्या और ठुकाई-पिटाई। निर्दोष लोग अफवाहों के कारण रोजिना कहीं ना कहीं ठुकते-पिटते जा रहे हैं। देश ने इस से पहले गौ तस्करी और गौ मांस के नाम पर ऐसा होते देखा। गाय के नाम पर हत्याएं हो चुकी हैं। गाय के नाम पर ठुकाई-पिटाई-सुड़ाई हो चुकी है। हम लोग वैचारिक रूप से इतने छोटे हो गए कि अफवाहें उड़ा के ले जाती हैं। हमारी सोच इतनी गिर गई कि अफवाहें जकड़ लेती हैं। ये ठीक नहीं हैं। पता है कि अफवाहखोर अफवाहें फैलाने से बाज नहीं आने हैं। ठीक तब होगा जब हम उसकी चपेट में आने से बचें और लोगों को भी बचाएं। अफवाहों से सावधान।