आदेश की ऐसी-तैसी

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कागद हाथ में आते ही आशंका हो गई थी कि चिंदिया बिखरनी है। कागद के टुकड़े हजार होगे कोई इधर गिरेगा-कोई उधर। किसी ने ना तो टुकड़े होते देख-ना किसी ने चुगे। लाइव देखने के बाद शंका-आशंका जमीन पे उतरी दिखाई पड़ गई। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे। हम 'पानी' की अहमियत कम नहीं कर रहे। हमारी तो क्या किसी की इतनी जुर्रत नहीं जो उस की महत्ता कम कर सके। इसी कारण कहावत के महावतों ने 'बिन पानी सब सून' रूपी हकीकत को कागदों में उतारा। इसके माने ये नहीं कि बाकी की सारी चीजों-वस्तुओं और प्रकृति द्वारा दिए गए तोहफों का कोई मोल नहीं। हरेक की अपनी महत्वता है। जिस को हम पत्थर और कांकरी कहते हैं वो भी अपनी जगह जोरदार पैठ रखते हैं। जरा सोचिए-कपड़े नहीं होते तो की होंदा। इक्कीसवीं सदी का मानखा भी 'नागाभुंगा' घूमता कि नहीं। धान-अनाज नहीं होता तो कंदमूल खाकर ही गुजारा करना पड़ता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वैसा होणा भी नहीं था। मानव सभ्यता का विकास हुआ तो जरूरतों का अविष्कार भी जरूरी था। मानखा अपनी आवश्यकताओं के मुजब अविष्कार करता रहा। अब तो उस ने विलासिताओं का अविष्कार कर दिया है और करता जा रहा है। हम चाहें तो कई आवश्यकताओ सुविधाओं और विलासिताओं के नाम गिना सकते हैं। पर गिना नहीं सकते। गिनती करने बैठ गए तो कैलेंडर बदल जाएगा। केलक्यूलेटर कोमा में चला जाएगा। गुरू गुगल भी कहेंगे-'माफ करो भाई। इन्हीं तमाम गवाहों और सबूतों को मद्देनजर रखते हुए सिरफ कागद कारे किए जा रहे हैं। बोले तो-सिरफ कागद की चर्चा की जा रही है। सुना है कि एक जमाने में भाईसेण पेड़ो की छाल और पत्तों पर लिखापढी करते थे। अपन को इस पर असमंजस। उस बखत में साक्षरता का पतियारा ही नही था तो लिखापढी कैसे की जाती होगी। पर मान लिया। मानखा बोलना सीखा तो लिखना-बांचणा भी सीख गया होगा। हम भले ही उसे 'घुड़के' कहें। उनके लिए भाषा-पढाई होती होगी। छाल-पत्तों का सफर कागद तक क्या पहुंचा-दुनिया आबाद हो गई। पुरखों की आवश्यकता को इतिहास में दबाकर आधुनिक मानखे ने सारा बोझ डिजीटल युग पे टेक दिया। पेपर लेस प्रथा शुरू कर दी। इससे पेड़-जंगल महफूज रहेंगे। कागद निर्माण के वास्ते पेड़ों की बलि ली जाती है। 'बिन कागद सब सून' इसलिए कहा कि इन का रूतबा हर जगह है। एक जमाने में प्रियतमा अपने पिया के कागद का इंतजार करती थी। पत्रों-चिट्ठियों का जोरदार प्रचलन था। स्कूलों में कॉपियां-किताबें। अस्पतालों में डाकसाब की परची। दफ्तरों से लेकर शासन-प्रशासन में कागदों का बोलबाला। जैक और चैक वालों के कागद कुलांचे मारते हैं। गरीब-गुरबे के कागद रूळके खाते हैं। आदेश और तबादला आदेश भी कागदों पर जारी होते है। तबादला आदेशों की पालना तो हो जाती है। दीगर आदेश नीचे तक पहुंचते-पहुंचते पीले पड़ जाते हैं। सरकारी कारिंदे में आदेशों की ऐसी तैसी करने की हौड़ मची रहती नजर आती है। इस बात की सुध लेने की फुरसत किसी के पास नहीं। किसी के पास झांक कर देखने का समय नहीं कि आदेशों की अनुपालना कितनी होती है। राज्य के श्रम विभाग द्वारा जारी आदेश उस की एक और मिसाल। विभाग ने पिछले दिनों एक अजब-अजीब आदेश जारी किया। उसे देखकर खाप पंचायतों के फैसले और कट्टरपंथियों के फतवे आंखों के सामने घूम गए। विभाग ने आदेश पर गरिमा का ठप्पा ठोका गया। श्रम आयुक्त द्वारा जारी आदेश में कहा गया कि कर्मचारी-कार्यालय में जींस और टीशर्ट पहन कर नहीं आएंगे। दफ्तर में ऐसे कपड़े पहन कर आना अशोभनीय और गरिमा के विपरित है। आदेश में जींस-टीशर्ट के स्थान पर पेंट व शर्ट-पहन कर आने की बात कही गई है। सुना-पढा तो ठीक भी लगा, नही भी। ठीक इसलिए लगा कि दफ्तर और कार्मिक गरिमापूर्ण नजर आएंगे। ठीक इस लिए नहीं लगा कि आजाद भारत में ऐसा संभव नहीं है। हुआ भी वही। आदेश निकला और दब के रह गया। विभाग के करमचारी अपनी पसंद की डे्रस पहन के दफ्तर जा रहे हैं। कोई जींस-टी शर्ट में तो कोई जींस-शर्ट और पेंट-टीशर्ट में। पूछा तो वही जवाब मिला जिसे शीर्षक बना के लटकाया। बोले तो-आदेश की ऐसी तेसी..।