जग में वांछै जीवणो

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जग में वांछै जीवणो, सै प्राणी समदाय।
हठ कर नर जिणनै हरै, जुलम कह्यो नहिं जाय।।

''इस संसार में सभी प्राणि-समुदाय जीना चाहते हैं, मरना कोई भी नहीं चाहता है। अब यदि कोई मनुष्य हठपूर्वक किसी प्राणि का प्राण हरते हैं तो उसका यह अत्याचार अकथनीय है।''

एक राजा के राज्य में एक महात्मा पधारे। राजा उनके दर्शनों के लिए गया। महात्मा के उपदेश और शिक्षाएं सुनकर वह बड़ा प्रभावित हुआ। उसने महात्मा से निवदेशन किया कि राजकुमार वयस्क हो रहा है। कल को उसे राज-पाट सम्हालना है, अत: आप उसे उचित शिक्षा दीजिए। महात्मा के स्वीकृति देने पर राजा ने अगले दिन राजकुमार को उनके पास भेजा। महात्मा ने उससे कहा कि वत्स, मैं तुझे एक ऐसी बात बताता हूं, जिसके धारण करने सेे तेरा कल्याण होगा। दया धर्म का मूल है। दया के समान कोई धर्म  नहीं है और पर पीड़ा के समान कोई पाप नहीं है। तू सदा दया को धारण करना, क्योंकि दया धर्म की माता है। मनुष्य को कृमि, कीट, पतंग और तृण, वृक्ष आदि पर भी दया करनी चाहिए और अपने ही समान दूसरे प्राणियों को समझना चाहिए। मैं तुझे निरपराध प्राणियों की हिंसा न करने के संबंध में एक कथा सुनाता हूं। ध्यान देकर सुन! छह आदमी एक बार एक गांव को लूटने गए। लूटने की पूर्व योजना बनाते हुए एक ने कहा कि गांव को लूटते हुए हमें सभी मनुष्यों और पशुओं का वध करना होगा। दूसरे ने कहा कि ऐसा करना ठीक नहीं है। पशुओं ने हमारा क्या बिगाड़ा? हमें केवल मनुष्यों का ही वध करना चाहिए। तीसरे ने कहा कि यह भी ठीक नहीं है। सभी मनुष्यों को मारने से क्या लाभ? केवल पुरूषों को ही मारना चाहिए, स्त्रियों और बच्चों को नहीं। चौथे ने कहा कि ऐसा करना भी अनुचित है। पुरूषों में भी केवल उन्हीं को मारना चाहिए जो हथियार बंद हो। निहत्थे पुरूषों को मारना ठीक नहीं है। पांचवें ने अपनी सम्मति दी कि सशस्त्र पुरूषों में भी केवल उन्हीं को मारना चाहिए, जो हमारा मुकाबला करे। जो हमारा सामना न करे, हमसे कुछ न कहें, उनको मारना ठीक नहीं है। आखिर में छठे लुटेरे ने अपनी राय दी कि देखो, मारना हमारा उद्देश्य नहीं है। हमारा उद्देश्य तो धन लूटना है। हमें तो धन लूटने पर ही ध्यान देना चाहिए। मार-काट से हमें क्या मतलब? वत्स, इस प्रकार छह लुटेेरों के मनोभाव उजागर हुए। इस प्रसंग को स्मरण रखते हुए सदा छठे लुटेरे की राय को सही समझना चाहिए। अहिंसा के मूल में भी दया-भाव ही निहित है। जो दया-धर्म  धारण करता है, उसे दीर्घायु की प्राप्ति होती है। उसे आरोग्य और सुयश का लाभ मिलता है। उसका जीवन सरल, सहज और सुखमय होता है। कल को तुम राज-पाट पर बैठोगे और प्रजा का पालन करोगे। ऐसे में तुझे दया-भाव रखना बहुत आवश्यक होगा। जैसे एक पिता अपने पुत्र की गलतियों को गंभीरता और संयम के साथ लेकर उसे सुधारने का प्रयत्न करता है, वैसे ही एक राजा को भी प्रजा के साथ व्यवहार करना अपेक्षित है। राजकुमार ने महात्मा से श्रद्धा-भाव से शिक्षा ग्रहण की। उसे इस बात का भान हुआ कि एक राजा को किस प्रकार अपनी प्रजा का पालन करना चाहिए।