एकमात्र राजस्थानी मासिक पारिवारिक पत्रिका माणक का राजस्थानी भाषा को समृद्ध बनाने में योगदान

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किणी ई संस्कृति रै जीवती रैवण रै लारै उणरी भाषा री महती भूमिका हुया करै। भाषा रै अभाव में संस्कृति रा तत्त्व बिसरीजण लागै, खतम हुवण लागै। राजस्थानी संस्कृति नै जीवती राखण सारू राजस्थानी भाषा नै ई जीवती राखणी जरूरी है। इणी बात नै सामी राखता थकां एक अैड़ी पत्रिका रै प्रकासण री जरूरत मैसूस करीजी, जिकी आम लोगां सूं जुड़'र आपणी संस्कृति नै जीवती राख सकै। इण सारू जकी कल्पना करीजी ही, सेवट 'माणक' रै विधिवत् प्रकासण सूं वा पूरी होयी।

11 जनवरी, 1981 नै दिल्ली रा कांस्टीटयूशन क्लब सभागार मांय तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष रै हाथां लोकार्पण सूं लेय'र अबार तांई एकमात्र पारिवारिक राजस्थानी मासिक 'माणक' राजस्थानी भाषा साहित्य, संस्कृति नै बेजोड़ योगदान दियौ है। राजस्थानी भाषा नै संवैधानिक मानता अर इणनै संरक्षण रा प्रयास पत्रकारिता रै माध्यम सूं एक मिशन रै रूप में आपरै सामी है।

दरअसल आम पाठकां सारू राजस्थानी पत्रकारिता दूजी-दूजी भाषावां री दांई नीं पनपण री एक खास वजै राजस्थानी भाषा नै संवैधानिक मान्यता नीं मिलण रै कारण राजकीय संरक्षण रौ अभाव है। आजादी मिलियां रै बाद राजस्थान प्रदेस रौ तौ गठण हुयग्यौ, पण राजस्थानी भाषा नै प्रादेसिक भाषा रौ दरजौ नीं दिरीयौ। अठै रै लोगां नै शिक्षा अर रुजगार रै वास्तै दूजा-दूजा प्रदेसां यूं आपरी मातृ भाषा राजस्थानी रौ माध्यम नीं मिल्यौ अर आ घणी लारै रैयगी। जदकै राजस्थानी सूं न्यारी हुयोड़ी गुजराती अर राजस्थानी सूं निकळयोड़ी नेपाली नै संवैधानिक मानता मिल्योड़ी है। हिंदी रौ आदिकाल राजस्थानी सूं इज मानीजै। 

जिण बगत 'माणक' रौ प्रकासण सरू करीयौ, उण बगत आ बात अच्छी तरै मालूम ही के राजस्थानी भाषा में पत्रिका चलावणौ कोई हंसी-खेल नीं हुवैला। जिकी ई समस्यावां ही, वै सगळी साफ दीसै ही। प्रमुख समस्या ही पाठकां री अर साधनां री। कारण के पाठकां रै बिना कोई पण पत्रिका नीं चाल सकै अर साधनां रै बिना ई कोई पण पत्रिका नीं पनप सकै। प्रदेस रा लोगां नै राजस्थानी पढण अर लिखण री आदत कोनी। पछै आरथिक साधनां री कमी पत्र-पत्रिकावां रै बंद हुवण रौ प्रमुख कारण हुवै। फेरूं ई इण बात रौ भरोसौ हौ के राजस्थानी पाठकां रै संबळ अर हेताळुवां रा विज्ञापन सैयोग बूतै इणनै जीवती राख लेवांला। आखै देस मांय अणगिणत राजस्थानी उद्योगपतियां रा बडा-बडा उद्योग है, सो इण पत्रिका सारू विज्ञापनां री कोई समस्या आडी नीं आवैला। पण, अफसोस री बात आ रैयी के इत्तै उद्योगपतियां रै हुवता थकां इर्र् 'माणक' नै उणां रौ विज्ञापन सैयोग कोई खास नीं मिल्यौ। तौ, एक तौ सरकार कानी सूं राजस्थानी नै मान्यता नीं, दूजै बडी संख्या में राजस्थानी रा पाठक नीं अर तीजै आपणै लोगां रौ चाईजतौ सैयोग नीं अैड़ी हालत मांय 'माणक' रौ प्रकासण लगौलग जारी राखणौ घणौ कठण काम रैयौ। पण, मायड़ भाषा रौ मोह राखतां हिम्मत नीं हारीजी अर 'माणक' रौ प्रकासण जिंया-तिंया लगौलग राखीयौ। आ बात न्यारी है के इणरै अंकां रै प्रकासण में कीं देर हुवती रैयी। कीं संयुक्तांक ई प्रकासित करीया। इण भांत नीं जाणै कित्ता ई उतार-चढाव देखतौ थकौ 'माणक' आपरै प्रकासण रा सैतीस बरस पूरा कर'र अड़तीसवां बरस में प्रवेश कर लियौ है आ घणै हरख-उछाव अर गुमान री बात तौ है ई। फगत म्हां लोगां सारू ई नीं, सगळै राजस्थानी पाठकां सारू ई।

आं 37 बरसां मांय आखिरकार 'माणक' राजस्थानी भाषा, साहित्य, संस्कृति अर समाज नै कांई योगदान दियौ? इण सवाल माथै गौर करणौ ई जरूरी है। क्यूंकै 'माणक' कोरौ साहित्यिक मासिक नीं रैय'र एक पारिवारिक मासिक रैयौ है, सो इण मांय साहित्येतर सामग्री री बहुलता रैयी है। भाषा-संस्कृति नै बचावणौ 'माणक' रौ मूळ उद्देस रैयां समाज नै साहित्य सूं ई जोड़यौ राखणौ जरूरी हौ। औ ई कारण रैयौ के इण मांय साहित्य नै भरपूर ठौड़ मिलती रैयी। 'माणक' आपरै प्रकासण रै जरियै जकौ दायित्व निभावतौ आयौ है उणरी उपलब्धि नै इण भांत आंक सकां लुप्त हुवतै राजस्थानी रै लोक साहित्य नै प्रकासण रै जरियै संरक्षित करणौ, दुरलभ हुय चुक्यै प्रकासित साहित्य नै मुद्रित कर'र सुलभ करावणौ, नवै साहित्य-सिरजण नै मैतव देवता थकां उणनै प्रकासित करणौ, राजस्थानी पाठकां नै अनुवादां रै प्रकासण रै जरियै भारतीय अर विश्व साहित्य सूं परिचित करावणौ, राजस्थानी साहित्य री खासियतां नै उजागर करता थकां भारतीय साहित्य रै त्हैत उणरौ मैतव रेखांकित करणौ, सामाजिक अर सांस्कृतिक सामग्री रौ प्रकासण करणौ, जुगानुकूळ वैज्ञानिक अर तकनीकी सामग्री नै ई प्रकासित करणौ, राजस्थानी पढण री आदत पाड़ता थकां पाठक त्यार करणा, नवै लेखकां री रचनावां प्रकासित करता थकां लेखकां री संख्या में बधापौ करणौ अर सै सूं मैतवपूरण राजस्थानी भाषा नै मान्यता दिरावण सारू आंदोलन नै गतिवान राखणौ।

आ अंजसजोग बात है के लारलै 37 बरसां मांय 'माणक' नीं सिरफ असंख्य पाठक त्यार करया, बल्कै अणगिणत नवा लेखक ई त्यार करया जिका पैलपरथम 'माणक' मांय ई प्रकासित हुया है। 

 कुल मिलाय'र आं 37 बरसां में जिका स्तंभ प्रकासित हुया,वां री विगत सूं आ बात साफ हुय जावै के 'माणक' साहित्येतर सामग्री रै अलावा रचनात्मक साहित्य अर लोक साहित्य रै साथै-साथै भाषा संबंधी सामग्री रौ प्रकासण ई बरौबर करयौ। न्यारै-न्यारै साहित्येतर स्तंभां रै त्हैत सांस्कृतिक अर सामाजिक सामग्री ई प्रचुर मात्रा में प्रकासित करी जिण में पुरातात्त्वि, अैतिहासिक, धारमिक, राजनीतिक, आरथिक, औद्योगिक, वैज्ञानिक अर कलावां संबंधी सामग्री गिणावणजोग है। इणरै अलावा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिराजी, राजीवजी, वाजपेयीजी सूं लेय'र न्यारा-न्यारा क्षेत्र री आगीवाण दोय सौ सूं बेसी प्रतिभावां रा 'आमी-सामी' में प्रकासित साक्षात्कार 'माणक' री महताऊ उपलब्धि है।
इणरै अलावा बगत-बगत माथै भांत-भांत रै विशेषांकां रै जरियै ई विषय-विशेष री भरपूर सामग्री प्रकासित करीजी। 101 वौं अंक राजस्थान रै सामान्यज्ञान माथै 200 पृष्ठां रौ निकाळयौ अर केई अंक न्यारै-न्यारै जिलां रा विशेषांक रूप ई निकाळया।
'माणक' राजस्थानी री न्यारी-न्यारी बोलियां नै बरौबर मैतव देवतौ आयौ है अरआं में भेयोड़ी रचनावां नै बिना किणी फेर-बदळ रै यूं-री-त्यूं छापतौ रैयौ है। हां, वर्तनी बाबत 'माणक' रौ आपरौ जरूर द्रिस्टीकोण है, अर न्यारी-न्यारी बोलियां री रचनावां छापतां वर्तनी री एकरूपता जरूर राखीजै।

एक पारिवारिक पत्रिका हुवता थकां ई 'माणक' री साख राजस्थानी संसार में बणी है तौ इणरै लारै ठोस प्रयास रैया है। भाषा री मानकता, विषयां री विविधता, सामग्री री बहुलता, पाठकां री मानसिकता, प्रस्तुति री सुंदरता इत्याद रौ ध्यान 'माणक' सावचेती सूं राखतौ आयौ है। बगत-बगत माथै बहुउपयोगी विशेषांकां में जथासंभव बेसी सूं बेसी सामग्री अर जाणकारी प्रस्तुत करणी 'माणक' री खासियत रैयी है। सांस्कृतिक अर साहित्यिक सामग्री री प्रामाणिकता रै साथै प्रस्तुति 'माणक' एक न्यारी पिछाण है। इणरै अलावा दुरलभ अर अग्यात साहित्यिक रचनावां नै ई 'माणक' प्रकासित करण में कोई पाछ नीं राखी। 'माणक' नै इण बात रौ जस है के औ राजस्थानी रै वरिष्ठ साहित्यकारां री रचनावां तौ प्रकासित करी ई है, साथै ई नवै सूं नवै लेखकां नै प्रकासित करण में ई कोई कमी नीं राखी है। पैल-परथम 'माणक' मांय प्रकासित हुवणिया केई लिखारा आज चावा राजस्थानी लेखक हुय चुक्या है। 

इण भांत नवै-पुराणै साहित्य साथै साहित्येतर भांतभंतीली सामग्री रौ प्रकासण करतौ थकौ 'माणक' राजस्थानी री सबद-संपदा बढावण में ई आपरौ महताऊ योगदान दियौ। कुल मिलाय'र सात दसक सूं चल्यै आय रैयै राजस्थानी भाषा आंदोलन नै गतिवान बणावतौ थकौ 'माणक' मायड़ भाषा री बेजोड़ सेवा करण में लाग्योड़ौ है।

देश विदेश में रह रिया प्रवासी राजस्थानी अर वठै री राजस्थानी संस्थावा माणक नै घणो मान देवे अर केई मौका माथै पुरस्कार देरर समानित ई करे । माणक ई लगोलग प्रवासी राजस्थानियाँ री हरेक उपलब्धियां , ख़ास आयोजना ने सचित्र शामिल करे आपरा हरेक अंक माय। यूँँ तो माणक रो हरेक अंक विशेष हुवे पण माणक मध्यप्रदेश विशेषांक’, ‘बिहार विशेषांक’, ‘ गुवाहाटी (असम) विशेषांक’ , ‘गांधीधाम (गुजरात) विशेषांक’, सिलीगुड़ी विशेषांक प्रकाशित कर जगे जगे राजस्थानियाँ रा योगदान बाबत ध्यान आकर्षित करिजिियो।

माणक रा केई अंका रौ विमोचन अपना आप माय अनुठा रिया है।  तेरापंथ जैन समाज माथै निकलयो अंक वा माय सूं एक हो। 

विदेशा रा नामी गिरामी लोग, सुप्रसिद्ध हस्तियां, नामी उद्योगपतिया, केई प्रधानमंत्री, न्यारा न्यारा प्रांता रा मुख्यमंत्री, देश प्रदेश रा राजनेता, मंत्री, आला अधिकारी, सिने जगत अर टीवी जगत री अनेको कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता, आधियात्मिक गुरु, जैन मुनि, बैंकिंग जगत अर कॉरपोरेट जगत रा जानिया मानिया लोगा ने समय समय माथै माणक भेंट स्वरुप दिरीजी । केई तो ई बात रो घणो अचरच करयो के राजस्थानी भाषा  री कोई पत्रिका निकले। 

आज जद मोटा-मोटा घराणा कानी सूं प्रकासित धर्मयुग, हिंदुस्तान, सारिका, माधुरी, रविवार जैड़ी पत्र-पत्रिकावां विज्ञापनां रै अभाव में पगां माथै ऊभी नीं हुयां बंद हुयगी तौ 'माणक' रौ नियमित प्रकासण कित्तौ दूभर है, आप भलीभांत समझ सकौ हौ। 

आप सगळा सूं आ इज अरज है के राजस्थानी भाषा ने जीवती राखण माय म्हाणो साथ दो अर कम सूं कम घर माय सगळा सूं आपरी मातृभाषा राजस्थानी में बात करण रो प्रण लेवो । जद ई आपणी नुवीं पीढ़ी ई इण खातर सचेत अर जागरूक हुवैला । यो काम मुश्किल जरूर लागै पण कोशिश करण सूं आपणा संस्कार आगै बड़ेला।  लुप्त हुवतो आपणो गौरवशाली इतिहास अर आपणी पिछाण जिंदा रेह सकेला।

 

जै राजस्थान जै जै राजस्थानी।