हम सुधरेंगे!

img

लगता है कि हम ने ना सुधरने की कसम खा रखी है। नारे लगाने को कहा जाए तो गूंजेगा-'गर्व से कहो-हम नहीं सुधरेंगे।' इस का कारण ये कि हम इतने 'छुट्टे' हो गए कि 'ताबे' करना मुश्किल। एक को लाईन पे लाओ तो एक हजार बे-लेण हो जाएंगे। हम वो काम अवश्य करेंगे। जिन के लिए मना करने का आग्रह-निवेदन किया जाता रहा है। नमस्ते कर के कहेंगे सुधरने में भलाई है। सुधर जाएंगे तो सब के लिए अच्छा है। नहीं सुधरे तो समय का इंतजार करना पड़ेगा। समय ने अगणित तुर्रम खानों को सुधार दिया है। शहर की एक हथाई पर आज उसी के चर्चे हो रहे थे।
पहले 'नमस्ते' की चर्चा। भारतीय संस्कृति में नमस्ते का अपना अहम स्थान है। आदर में-नमस्ते। अभिवादन में-नमस्ते। एक-दूसरे से भेंट-मुलाकात करने के दौरान 'नमस्ते' करना हमारी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अभिवादन के सुर-शब्द और तौर-तरीके भले ही अलग-अलग हो सकते हैं। मूल भावना एक। देश का प्रत्येक सभ्य मानखा एक दिन में कम से कम पचास मर्तबे नमस्ते करता है। नमस्ते स्वीकार करता है। 
नमस्ते की चर्चा इसलिए की कि इस के पीछे नया अटंग सुधारवादी तरीका छुपा है। आपणी रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने अदीतवार को नाथुला बॉर्डर का दौरा किया। भारत-चीन सीमा क्षेत्र पर स्थित यह बॉर्डर गाहे-बगाहे चर्चा में रह चुका है। सीताजी ने वहां तैनात चीनी सैनिकों से बातचीत की और उन्हें 'नमस्ते' करना सिखाया। भारत और चीन के रिश्ते बनते-बिगड़ते रहे हैं। चीन का हाथ पाकिस्तान के सिर पर और भारत के लिए पाक आतंक और आतंकवादियों की खान। उग्रवादियों की सरकारपरस्त फैक्ट्री। पाक का सिर सहलाने के पीछे चीन के अपने स्वार्थ हैं। चीन भारत के साथ भी कोई ना कोई कुचमादी करता रहा है। कभी इस क्षेत्र में सड़क निर्माण का प्रयास तो कहीं उस क्षेत्र में अतिक्रमण की कोशिश। इस प्रयास में उस ने हर बार मात भी खाई। सुधरने का आश्वासन दिया मगर थोडे दिन बाद फिर वही हरकतें।
अपने दौरे के दौरान भारतीय रक्षा मंत्री ने चीनी जवानों को नमस्ते बोलना और नमस्ते करना सिखाया। चीनियों ने  भी उन का अनुसरण किया। सीताजी को आदर के साथ नमस्ते किया। रक्षा मंत्री इस का जवाब भी 'नीं हाओ' से दिया। इस के बारे में उन्होंने चीनी सैनिकों से जानकारी ली। उन्हीं से नमस्ते का चीनी में अनुवाद करवा कर और 'नीं हाओ' कह के उनका अभिवादन किया। भावना  ये कि शायद चीन की आंखें खुल जाए। शायद सुधर जाए। ऐसा होता दिख तो नहीं रहा। दिख जाए तो सभी  के लिए फायदेमंद। नहीं सुधरने की आशंका इसलिए कि जब हम छोटी-छोटी बातों को लेकर नहीं सुधर रहे तो दूसरों से अपेक्षा कैसे की जा सकती है। जहां तक अपनी बात है। अपन देश की आजादी के बाद से ही 'छुट्टे' होना शुरू हो गए। आजादी का दुरूपयोग करना शुरू कर दिया। आजादी के नाम पर नंगाईयों पे उतर आए। आजादी को बेजा मनमानी से जोड़ दिया। जो चाहा कर दिया। जो चाहा बक दिया। जो चाहा लिख दिया। लोग पहले से ही बे-लेण थे। सोशल मीडिया तो बेड़ा गर्क करता जा रहा है। एक तो आंखें फोड़ो। दूसरा वक्त जाया करो। तिस पर बकवास देखने-सुनने को मिलती है। नेट का किराया भुगतना पड़ता है, सो अलग।
सुधरने या ना सुधरने की चर्चा इसलिए की कि हमें सीख से उलटा चलने की आदत पड़ गई है। सीख हमें कुछ सिखाने के लिए दी जाती है मगर हम उसे हवा में उड़ा देते हैं। सीख की चिंदिया बिखेर देते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे कोई कह रहा हो-'सीख देने वालों की 'मैं टांग-तोडऩे आया हूं।' यदि हम लोग अपने सामाजिक सरोकारों का ईमानदारी से निर्वहन करते तो लिखा पढी की जरूरत नहीं पड़ती। लिखने वालों ने लिख कर टांग-दिया। टांग कर खुश हो गए। उन्हें देखिए जो लिखे के साथ खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रहे। उसमें हम-आप भी शामिल हो सकते हैं। नहीं हैं तो अच्छा है और अच्छा तब होगा जब लोग सीख लेंगे। सुधरने का प्रयास करेंगे। कोई सुधरे या ना सुधरे प्रयास जारी रखने चाहिएं। हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा। 
हम कचरा वहीं टेकते हैं जहां कचरा ना डालने का आग्रह लिखा होता है। नो पार्किंग जोन में वाहन खड़े कर देना जैसे अधिकार बन गया है। ऊपर लिखा है-'यहां पीक ना थूकें' नीचे का खांचा लाल चुट्ट। यहां कृपया शांति बनाए रखें लिखा है। वहां इतना शोर कि कुछ सुनाई ना दे। लिखा है-धीरे चलें और छोरे गाडिय़ां धुंधा रहे हैं। लिखा है-हॉन न बजाएं और हम हॉर्न चुंचा रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या हमें इन छोटी-मोटी बातों के लिए सीख लेने की जरूरत है? हम ऐसा नहीं कर रहे, तभी तो लिखकर टांगने की जरूरत पडी और हम है कि इसके बावजूद सुधर नहीं रहे। हो सकता है इसमें हम-आप भी शामिल हों। ऐसा है तो खुद से शुरू करने की जरूरत है। युग को सुधार सकें या नहीं। खुद तो सुधर ही सकते हैं। नहीं सुधरे तो फोड़े पाणे ही हैं।