90 के दौर का रिटर्न टिकट है 'ये मेरी फैमिली

img

मुंबई
‘गर्मी का मौसम मौसम नहीं एक फेस्टिवल है’, सुन कर झटका लगा न कि भला मौसम और त्यौहार, माजरा क्या है, क्योंकि अब तो त्यौहार हम मनाते कहां हैं, दिखाते हैं... सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर! हैशटैग वाली दीवाली, हैश टैग वाली होली, फीलिंग इन एमोजी वाली बनावटी वाली स्माइल की हजारों फेक तस्वीरों के साथ। त्योहारों के लम्हें अब कैमरे के क्लिक क्लिक और फ़्लैश में तो कहीं, हाई फाई महंगे वाले मोबाईल फोन के डिजिटल इनबॉक्स में कैद हो जाते हैं, इमोशन से लेकर डिवोशन तक की तस्वीरें एक सी हैं। उस मोबाइल फोन के इनबॉक्स में हजार से भी ज्यादा तस्वीरों को कैद करने की तो मेमोरी चिप तो मौजूद है, मगर मेमोरेबल मोमेंट्स में वो इमोशन फूंकने की कुब्बत नहीं। उस मोबाइल फोन में, उस सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सेल्फी तो हजारों क्लिक हो जाती है, लाइक और शेयर भी मिल जाते है, लेकिन वो संवेदना नहीं जगा पाती, जो यादें कैमरे के नेगेटिव रोल से लम्बा सफ़र तय करके उस सस्ते से लेकिन अजीज से फोटो एल्बम तक पहुंचते थे और जिसे वाकई में खुशियां मनाने के लिए किसी फेस्टिवल का इंतेजार नहीं होता था। इसलिए गर्मी का मौसम मौसम नहीं त्योहार था। वह आजकल की तरह किसी स्पेशल डे का मोहताज नहीं था, बल्कि गर्मी के दिनों की वो छुट्टियां ही सबसे बड़ा त्योहार होती थीं, किसी कार्निवाल की तरह। टीवीऍफ़ प्ले के वेब सीरिज 'ये मेरी फैमिली' अपने सात एपिसोड्स के माध्यम से सीधे आपकी जिंदगी की उसी नॉस्टेल्जिक ट्रिप पर लेकर जाती है, जब जिंदगी फेसबुक पर 24 घंटे अपडेट नहीं, बल्कि फेस टू फेस जी भर के जी जाती थी, तब भी ट्रोलिंग होती थी लेकिन सोशल साईट पर बैठ कर किसी अनजाने की नहीं, बल्कि भाई-बहनों की टांग खिंचाई में असली ट्रोलिंग का मजा था। निर्देशक समीर सक्सेना और राइटर सौरभ खन्ना की साझेदारी इस शो में ठीक वैसे ही है, जैसे कभी 90 के दशक में सचिन और सहवाग की पार्टनरशिप। इस शो में दोनों की वहीं ट्यूनिंग नज़र आती है। निर्देशक अपने निर्देशन से हमें 90 की उन गलियों की सैर एक बार फिर से कराते हैं, जो गलियां हम कई साल पहले छोड़ आये हैं वहीं लेखक ने उस दौर की बारीकियों को दर्शाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। इस शो में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि लेखक निर्देशक के साथ, शो के कॉस्टयूम मेकर और आर्ट डिपार्टमेंट के सदस्यों को उस दौर की हर एक छोटे-छोटे सामान सहेजने में मशक्कत तो करनी पड़ी होगी। क्योंकि जैसे 90 की यादें धुंधली हो रही हैं, उस दौर के वो सामान भी अब जाहिर हैं काफी आउटडेटेड हो चुके हैं। फिर भी शो में जिस तरह वॉकमेन, स्कूटर, मारुति कार, कॉमिक्स की किताबें, डब्ल्यू डब्ल्यू ऍफ़ के कार्ड्स, रूह आफजा शर्बत, रेडियो, एयरकूलर, शक्तिमान के पोस्टर्स , फैंटम सिगरेट, फैशन टीवी, कोचिंग क्लासेज, पूरे परिवार के साथ आम खाने का मजा, जिल्द लगी किताबें और सबसे खास उस दौर की मम्मियों का पैसे छुपाने वाला सामान्य सी चेन वाला बटुआ हर चीज में 90 के फ्लेवर को जिन्दा रखने की कोशिश की है। इस शो की सार्थकता की वजह यह भी है कि शो के मेकर्स ने बिल्कुल सटीक कास्टिंग की है, मोना सिंह ने एक ऐसी मां के किरदार को जीवंत बनाया है, जो 90s की फ़िल्मी मम्मियों की तरह सिर्फ बच्चों पर चाशनी वाला प्यार नहीं दर्शाती, बल्कि रियल जिंदगी के बिल्कुल करीब ज़ूम इन करती है। वहीं आकर्ष खुराना ने एक पिता के रूप में सरल और सहज अभिनय किया है। विशेष बंसल ने मुख्य किरदार हर्षु के रूप में पूर्ण रूप से न्याय किया है। अहान ने बड़े भाई के रूप में सार्थक योगदान दिया है। शैंकी के रूप में प्रसाद रेड्डी में योग्यता नज़र आती है। समर यानी गर्मियों के मौसम के इस कार्निवाल का अगर मजा लेना चाहते हैं और 90 के उस गोल्डन एरा की यादों में फिर से उस फ्लैशबैक में खोना चाहते हैं तो सोशल मीडिया की दुनिया से एक दिन की छुट्टी लेकर इस समर होलीडे का मजा ले सकते हैं। यकीन मानिए  'ये मेरी फैमिली' आपके लिए एक बेहतरीन रिटर्न टिकट साबित होगी। मुमकिन हो कि इसे देखने के बाद आपको अपनी अपडेट लगने वाली रूटीन लाइफ आउटडेटेड लगे और आप एक बार फिर से उन रिश्तों और अपनों से फिर से फेस टू फेस टकराने की कोशिश करें, और उस दीवार को तोड़ने कोशिश करें जो कि अब केवल दिखावे के लिए फेसबुक वॉल पर ही नजर आती है।

whatsapp mail