अयोध्या विवाद में नया मोड़ : केंद्र के भूमि अधिग्रहण एक्ट को अवैध बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका

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नई दिल्ली
अयोध्या के राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में अब एक और नया मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें चौंकाने वाला दावा किया गया है। याचिका में अयोध्या भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 की वैधता पर ही सवाल उठाया गया है। इसके साथ ही इस भूमि अधिग्रहण अधिनियम को रद्द करने की मांग की गई है। केंद्र की अर्जी को भी इस याचिका में चुनौती दी गई है। अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवादित स्थल के पास की भूमि अधिग्रहण करने संबंधी 1993 के केन्द्रीय कानून की संवैधानिक वैधता को सोमवार को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी। स्वयं को राम लला का भक्त बताने का दावा करने वाले वकीलों के एक समूह ने यह याचिका दायर की है। इस याचिका में दलील दी गयी है कि संसद राज्य की भूमि का अधिग्रहण करने के लिये कानून बनाने में सक्षम नहीं है। याचिका में कहा गया है कि राज्य की सीमा के भीतर धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन के लिये कानून बनाने का अधिकार राज्य विधानमंडल के पास है।

अयोध्या भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 को बताया अवैध
राम लला के भक्त होने का दावा करने वाले लखनऊ के दो वकीलों समेत सात लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है। याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि राज्य की राज्य सूची के विषयों की आड़ में राज्य सरकार के अधीन आने वाली जमीम को केंद्र अधिग्रहीत नहीं कर सकता है। दावा किया गया है कि जिस अयोध्या अधिनियम के तहत 1993 में केंद्र की तात्कालिक नरसिंहराव सरकार ने 67.7 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की, वह अधिनियम बनाना संसद के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं था। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गैर-विवादित जमीन को लेकर याचिका लगाई थी। जिसमें मांग की गई थी कि जिस जमीन को लेकर विवाद है, उसे छोड़ बाकि अधिग्रहीत 67.7 एकड़ जमीन उसके मालिकों रामजन्म भूमि न्यास और अन्य को वापस कर दी जाए। जमीन का विवाद सिर्फ 0.313 एकड़़ का है बल्कि बाकी जमीन पर कोई विवाद नहीं है। याचिका में 13 मार्च 2003 की यथास्थिति को बनाए रखने का आदेश रद्द करने की मांग की थी।

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