केंद्र ने बदली नीति, दलित छात्रावास बनाने के लिए अब एनजीओ को नहीं मिलेगा पैसा

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नई दिल्ली

दलितों के लिए छात्रावास बनाने के नाम पर जारी 'लूट' पर केंद्र ने एक बड़ा प्रहार किया है। इसके तहत करीब तीन दशक पुरानी उस नीति को बदल दिया है, जिसके तहत दलित छात्रावास बनाने के लिए निजी संस्थान और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को भी शत प्रतिशत मदद दी जाती थी। नई नीति के तहत किसी भी निजी संस्थान और एनजीओ को अब इसके निर्माण के लिए एक भी पैसा नहीं मिलेगा। मौजूदा नीति के तहत दलित छात्रावास बनाने के लिए सरकार की ओर से प्रति सीट तीन लाख रुपए दिए जाते थे, वहीं उत्तर-पूर्व और हिमालयी राज्यों को प्रति सीट साढ़े तीन लाख रुपए दिए जाते है। सरकार ने दलित छात्रावासों के निर्माण की नीति में यह बदलाव बिहार के मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश के देवरिया जैसी घटनाओं सहित देश भर से इस तरह के छात्रावासों को लेकर मिली शिकायतों के बाद उठाया है। जिसमें निजी संस्थानों और एनजीओ ने दलितों के नाम पर छात्रावास बनाने के लिए सरकार से मोटी रकम ली, लेकिन बाद में वह इसका निजी इस्तेमाल करने लगे थे, या फिर इसे अपनी कमाई का जरिया बना लिया था। सरकार के पास पहुंची इस तरह की शिकायतों में बड़ी संख्या में निजी शैक्षणिक संस्थान भी थे। जिन्होंने सरकार से दलित छात्रावास बनाने के लिए नाम पर पैसा लिया और बाद में वह इसका इस्तेमाल व्यवसायिक रुप से कालेज छात्रावास के रुप में करने लगे थे। दलितों के शैक्षणिक स्तर को बढ़ाने के लिए सरकार ने विशेष छात्रावास बनाने की यह योजना 1989 में शुरू की थी। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के मुताबिक बाबू जगजीवन राम छात्रावास योजना की नई नीति के तहत दलितों के लिए छात्रावास बनाने के लिए पैसा अब सिर्फ सरकारी संस्थानों को ही दिया जाएगा। राज्यों को भी इस नई नीति का मसौदा भेज दिया गया है। साथ ही निर्देश दिया है कि वह अब नई नीति के तहत ही कोई प्रस्ताव भेजें। योजना के तहत ऐसे छात्रावास उन सभी ब्लाकों में ही खोले जा सकते है, जहां दलितों की आबादी 20 फीसद या उससे अधिक हो। सरकार ने इसके अलावा नई नीति के तहत पहले से स्थापित ऐसे सभी छात्रावासों की सलाना ऑडिट कराने का भी व्यवस्था तय की है। साथ ही उन्हें दी जाने वाली वित्तीय मदद पर भी निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए है।

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