जानें किन गुणों ने बनाया भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम 

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भारतीय संस्कृति के आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में मूर्तिमान करने वाले चौबीस अथवा दस अवतारों की श्रृंखला में भगवान राम और कृष्ण का विशिष्ट स्थान है। उन्हें भारतीय धर्म के आकाश में चमकने वाले सूर्य और चंद्र कहा जा सकता है। उन्होंने व्यक्ति और समाज के उत्कृष्ट स्वरूप को अक्षुण्ण रखने एवं विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए, इसे अपने पुण्य-चरित्रों द्वारा जन साधारण के सामने प्रस्तुत किया है। ठोस शिक्षा की पद्धति भी यही है कि जो कहना हो, जो सिखाना हो, जो करना हो, उसे वाणी से कम और अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने वाले आत्म-चरित्र द्वारा अधिक व्यक्त किया जाय। वैसे सभी अवतारों के अवतरण का प्रयोजन यही रहा है, पर भगवान राम और भगवान कृष्ण ने उसे अपने दिव्य चरित्रों द्वारा और भी अधिक स्पष्ट एवं प्रखर रूप में बहुमुखी धाराओं सहित प्रस्तुत किया है। रामचरित  मानसÓ में भी इसके प्रमाण स्वरूप अनेक प्रसंग उपलब्ध होते हैं। जब राजा दशरथ ने देखा कि श्रीराम उत्तरदायित्व सँभालने योग्य हो गये हैं, तो उन्होंने वानप्रस्थ में प्रवेश के लिए उत्तरदायित्वों से मुक्त होने की योजना बनाई, किन्तु उसके सम्बन्ध में अकेले निर्णय नहीं लिया। वे पहले गुरु वसिष्ठ जी से परामर्श करते हैं और फिर सभी सहयोगी  कार्यकत्र्ताओं से सहमति प्राप्त करते हैं। 
मुदित महीपति मंदिर आये। सेवक सचिव सुमंत्र बुलाये।।
जो पाँचहि मत लागइ नीका। करहु हरिष हिय रामहिं टीका।।
व्यवस्थात्मक उत्तरदायित्व जिस किसी पर भी हो, उसे सामूहिकता की मर्यादा बनाये ही रखनी चाहिए। उससे परस्पर स्नेहभाव भी बढ़ता है तथा अपेक्षाकृत अधिक उपयोगी हल भी निकाले जा सकते हैं। राजा दशरथ की मृत्यु के बाद गुरु वसिष्ठ पर राज्यव्यवस्था का प्रधान उत्तरदायित्व आ पड़ा। भरत को राज्य देने के प्रसंग में वे भी उसी पद्धति का निर्वाह करते हैं। 

सुदिन सोधि मुनिवर तब आये। सचिव महाजन सकल बोलाये॥ बैठे राज सभा सब जाई। पठये बोलि भरत दोउ भाई॥
व्यवस्थापक ही नहीं, सामान्य नागरिक तथा कार्यकत्र्ता भी यदि सामूहिकता का लाभ उठाने के अभ्यस्त हैं तो विषम परिस्थितियों में भी मार्ग निकाल लेते हैं। सीता की खोज में निकले योद्धा जब अवधि पूरी होने पर भी कोई सूत्र नहीं पा सके, तो उन्होंने भी सामूहिक परामर्श एवं चिन्तन का मार्ग पकड़ा। 

इहाँ विचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं॥
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लये करब का भ्राता॥
श्री रामचन्द्र जी अपनी वन यात्रा में जन-जन की सद्भावना जीतते हुए, उन्हें स्नेहसूत्र में आबद्ध करते हुए चलते हैं। उनमें सहयोगवृत्ति जाग्रत् करते चलते हैं। वन में इसी उद्देश्य से निकल पड़ते हैं और नगर में वह प्रवृत्ति जाग्रत् रखने के लिये आग्रह करके जाते हैं। भरत के लिये उन्होंने यही संदेश छोड़ा कि सामूहिक हित को ध्यान में रखकर चलें। गुरु वसिष्ठ जी से भी यही आग्रह करते हैं। 
 

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