शिरडी : जहां कड़वी नीम भी देती हैं मिठास 

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संत साईं बाबा एक भारतीय गुरू, योगी, संत और फकीर कहलाए जाते हैं। साईं बाबा कौन थे और उनका जन्म कहां हुआ था यह प्रश्न ऐसे हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है। साईं ने कभी इन बातों का जिक्र नहीं किया। इनके माता-पिता कौन थे इसकी भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। बस एक बार अपने एक भक्त के पूछने पर साईं ने कहा था कि, उनका जन्म 28 सितंबर 1836 को हुआ था। इसलिए हर साल 28 सितंबर को साईं का जन्मोत्सव मनाया जाता है।
फकीर से संत बनने की कहानी
ऐसा माना जाता है कि सन् 1854 में पहली बार साईं बाबा शिरडी में दिखाई दिए। उस समय बाबा की उम्र लगभग 16 साल  थी। शिरडी के लोगों ने बाबा को पहली बार एक नीम के वृक्ष के नीचे समाधि में लीन देखा। कम उम्र में सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास की जरा भी चिंता किए बगैर बालयोगी को कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ।कैसा पड़ा साईं नाम
कुछ दिनों तक शिरडी में रहकर साईं एक दिन किसी से कुछ कहे बिना अचानक वहां से चले गए। कुछ सालों के बाद साई फिर शिरडी में पहुंचे। खंडोबा मंदिर के पुजारी ने साईं को देखते ही कहा 'आओ साईंÓ इस स्वागत संबोधन के बाद से ही शिरडी का फकीर 'साईं बाबाÓ कहलाने लगा। 
साईं का शुरुआती जीवन
शिरडी के लोग शुरू में साईं बाबा को पागल समझते थे लेकिन धीरे-धीरे उनकी शक्ति और गुणों को जानने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ती गयी। साईं बाबा शिरडी के केवल पांच परिवारों से रोज दिन में दो बार भिक्षा मांगते थे। वे टीन के बर्तन में तरल पदार्थ और कंधे पर टंगे हुए कपड़े की झोली में रोटी और ठोस पदार्थ इक_ा किया करते थे। सभी सामग्रियों को वे द्वारका माई लाकर मिट्टी के बड़े बर्तन में मिलाकर रख देते थे। कुत्ते, बिल्लियां, चिडिय़ा नि:संकोच आकर खाने का कुछ अंश खा लेते थे, बची हुए भिक्षा को साईं बाबा भक्तों के साथ मिल बांट कर खाते थे।

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