देश ही नहीं विदेशों में भी है कई शक्तिपीठ, जिनकी है अलग-अलग मान्यताएं

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नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो चुका है। आने वाले 9 दिनों तक माता के 9 अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होगी। माता रानी के भक्त इस अवसर पर देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों के दर्शन करने के लिए माता के द्वार जाते हैं। भारत में कई शक्तिपीठ है। दुर्गा सप्तशती के अनुसार जब माता सती ने अपना प्राण हवन कुंड में त्याग दिया था तब भगवान शिव ने सती के शरीर को लेकर कंधे पर तांडव करने लगे थे। भगवान शिव को ऐसे करने से रोकने के लिए विष्णु जी ने चक्र चलाकर देवी सती के कई टुकड़े कर दिए। जिन स्थानों पर माता सती के अंग और आभूषण गिरे वे ही शक्तिपीठ कहलाए जाने लगे। माता सती के कुछ अंग और आभूषण देश के बाहर भी गिरे थे जहां आज भी शक्तिपीठ स्थित है। माता का यह शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है। माता का यह शक्तिपीठ हिंगजाल देवी के नाम से जाना जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने सती वियोग में तांडव करना शुरू कर दिया था तब भगवान विष्णु के चक्र से कटकर इसी स्थान पर देवी सती का सिर गिरा था। इसलिए यह स्थान चमत्कारी और दिव्य माना जाता है। पाकिस्तान में देवी हिंगलाज को नानी का मंदिर और नानी का हज भी कहते हैं।
देश के बाहर दूसरा शक्तिपीठ बांग्लादेश के शिकारपुर नामक स्थान पर है।  इस शक्तिपीठ को उग्रतारा शक्तिपीठ कहा जाता है जो सुनंदा नदी के तट पर स्थित है। इस स्थान पर माता सती की नासिका अर्थात नाक गिरी थी। इस कारण से इस शक्तिपीठ की मान्यता है। इसके अलावा बांग्लादेश में तीन स्थानों पर भी और भी शक्तिपीठ है। अपर्णा शक्तिपीठ बांग्लादेश के भवानीपुर गांव में है। इस स्थान पर सती की बाएं पैर की पायल गिरी थी। माता का तीसरा शक्ति पीठ चटगांव में स्थित है जहां पर माता की दायी भुजा गिरी थी। जबकि बायीं हथेली बांग्लादेश के यशोर नामक शहर में गिरी थी। नेपाल में भी माता के कई शक्तिपीठ हैं। नेपाल के गंडक नदी पर आद्याशक्ति का पीठ है। इस स्थान पर माता सती का दांया गाल गिरा था। इस स्थान पर देवी को गंडकी रूप में पूजा जाता है। वहीं नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के पास गुहेश्वरी मंदिर में माता के दोनों घुटने गिरे थे। इस अलावा  नेपाल के जनकपुर में वनदुर्गा, जयमंगला और उग्रतारा मंदिर को भी शक्तिपीठ माना जाता है।

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