जानिए मूर्ति स्थापना से विसर्जन तक की सारी प्रक्रिया

img

हिन्दू पंचांग के अनुसार हर साल आश्विवन मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी से लेकर विजयादशमी तक दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता है। इस बार 15 अक्टूबर से लेकर 19 अक्टूबर तक दुर्गा उत्सव मनाया जाएगा। नवरात्रि पर दुर्गा पूजा मुख्य रूप से बंगाल में मनाया जाता है। यहां के पंडालों की भव्यता देश-विदेश में मशहूर होती है। पश्चिम बंगाल के अलावा देश के हर हिस्से में दुर्गा उत्सव बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस दुर्गा पूजा को अलग अलग राज्यों में कई नामों से संबोधित किया जाता है। भव्य पंडाल में मां दुर्गा की प्रतिमा को स्थापित की जाती है जिसमें 5 दिनों तक कई तरह के कार्यक्रम होते हैं।
दुर्गा उत्सव क्यों
नवरात्रि में 9 दिन तक देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की उपासना होती है। दुर्गा पूजा मनाए जाने के पीछे कई कारण है। ऐसी मान्यता है कि माता दुर्गा ने महिषासुर नाम के राक्षस का वध कर सभी देवी-देवताओं को उसके भय से मुक्ति दिलाया था। इसके अलावा ऐसी मान्यता है माता इन्हीं दिनों अपने मायके पृथ्वी लोक आती हैं जिसकी खुशी में दुर्गा उत्सव मनाया जाता है।
दुर्गा पूजा का कार्यक्रम
नवरात्रि के पहले दिन महालया अमवास्या पर पितरों का तर्पण करने के बाद माता दुर्गा का कैलाश पर्वत से पृथ्वी लोक पर आगमन होता है। नौ दिनों तक हर रोज देवी के अलग-अलग स्वरूपों में से एक रूप की पूजा की जाती है। नवरात्रि के षष्ठी तिथि के दिन पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। मां दुर्गा की प्रतिमा के अलावा पंडाल में देवी सरस्वती, लक्ष्मी, भगवान गणेश, कार्तिकेय और राक्षस महिषासुर की मूर्तियों को रखा जाता है।
सप्तमी तिथि पर मां को भोग लगाया जाता है जिसमें उनका मनपसंद भोग जैसे खिचड़ी, पापड़, सब्जियां, बैंगन भाजा और रसगुल्ला जैसी चीजें शामिल होती हैं। अष्टमी पर भी मां को भोग लगाया जाता है और नवमी की तिथि माता की इस पृथ्वीलोक पर आखिर दिन होता है। दशमी तिथि पर यानी दशहरे वाले दिन सिंदूर की होली खेल कर माता को विसर्जित कर विदाई दी जाती है। 
पंडाल और भोज
दुर्गा पूजा में माता के विशाल और भव्य पंडाल बनाए जाते हैं जिसकी आभा देखने लायक होती है। शाम होते ही इन पंडालों में भक्तों की भीड़ उमडऩे लगती है। पांच दिनों तक माता को भोग लगाया जाता है जिसे प्रसाद के रूप में लोगों के बीच वितरित किया जाता हैं।
विशेष नृत्य धुनुची का आयोजन
दुर्गा उत्सव में एक विशेष तरह का नृत्य प्रस्तुत किया जाता है जिसे धुनुची डांस का कहा जाता है। इस डांस में एक विशेष तरह के मिट्टी के पात्र में सूखे नारियल के छिलकों को जलाकर माता की आरती की जाती है। आरती के वक्त इस धुनुची डांस में कई तरह के करतब दिखाए जाते हैं।
विसर्जन और सिंदूर होली
विजयादशमी के दिन माता की पूजा करने के बाद उन्हें सिंदूर और भोग लगाया जाता है। इस दौरान सभी महिलाएं आपस में एक-दूसरों को सिंदूर से लगाती हैं जिसे सिंदूर खेला कहा जाता है। ऐसी मान्यता है विदाई के वक्त माता को सिंदूर लगाकर उन्हें ससुराल के लिए विदा किया जाता है। इसके बाद माता की प्रतिमा को नदी में विसर्जित कर दिया जाता है।
 

whatsapp mail