कृषि अनुसंधानों का लाभ उठायें किसान : डॉ. के. पी. सिंह

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25 वें सरसों विज्ञान मेले का हुआ आयोजन

भरतपुर
अनुसंधानों द्वारा कई उन्नत किस्मों एवं तकनीको का विकास कर लिया गया है। किसानों को उन अनुसंधानों का लाभ उठाकर कृषि उत्पादन को बढ़ाना चाहिए। किसानों की आमदनी बढऩे से ही देश के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास को गति मिलेगी। प्रधानमंत्री की आशाओं के अनुरूप हमें किसानों की आय दुगुनी करने के लिए अनुसंधान केन्द्रों, कृषि विभागों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, गैर सरकारी संगठनों एवं सभी संस्थाओं में बेहतर तालमेल बनाकर किसानों को उन्नत तकनीकों के बारे में जागरूक करना और उन्हे सही प्रशिक्षण देने से ही कृषि की प्रगति संभव है। यह बात गुरुवार को सरसों अनुसंघान निदेशालय के 25 वें सरसों विज्ञान मेले के अवसर पर मुख्य अतिथि कृृषि विशेषज्ञ डॉ. के. पी. सिंह ने किसानों को संबोधित करते हुये कही। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि डॉ. एस. के. दलाल, नेशनल कंसलटेन्ट, ऑयल सीड डिविजन, कृष्ज्ञि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार ने विश्व एवं देश में तिलहन उत्पादन, क्षेत्रफल एवं उत्पादकता कि स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश की खाद्य तेलों की मांग को पूरा करने के लिए तिलहनी फसलों का उत्पादन बढाना पहली प्राथमिकता है। खाद्यान्नों की तरह तिलहनों एवं दलहनों में आत्मनिर्भर होने पर देश के कृषि विकास को गति मिलेगी। उन्होने किसानों से आग्रह किया कि निदेशालय द्वारा विकसित किस्में जो अधिक उत्पादन दे रही है उनका उपयोग करें।  वहीं डॉ. आर. पी. सिंह रतन, पूर्व प्रसार निदेशक, विरसा कृषि विश्वविद्यालय रांची ने कहा कि किसानों की आय बढानें में तकनीकी विकास का बहुत बडा योगदान है। किसान एवं वैज्ञानिकों को मिलकर अनुसंधान की दिशा तय करनी चाहिए। 
इस अवसर पर निदेशालय के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने कहा कि राई-सरसों फसल का भारतीय आर्थिक व्यवस्था में एक विषेश स्थान है। देश में वैज्ञानिकों द्वारा विकसित उन्नत किस्मों एवं तकनीकों को किसानों द्वारा अपनाकर तिलहनों में भी आत्मनिर्भरता प्राप्त करना संभव है। इसके लिए वैज्ञानिकों, प्रसार अधिकारियों एवं किसानों को मिलकर काम करना होगा।  इस अवसर पर कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक देशराज सिंह ने कहा कि अधिकतर किसान छोटी जोत वाले है जिनके पास साधनों की कमी है। खेती के लिए कई उपयोगी कृृशि उपकरणों का विकास किया गया है लेकिन छोटे किसान उनका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। किसानों को कृशि से टिकाऊ आजीविका प्राप्त करने के लिए परम्परागत कृशि के साथ एकीकृत कृशि प्रबंधन को अपनाना होगा। इस अवसर पर परियोजना निदेशक, आत्मा, योगेया शर्मा, कृषि महाविद्यालय, कुम्हेर के अधिष्ठता डा. अमर सिंह, कृषि उप अनुसंधान केन्द्र के प्रभारी डॉ. उदयभान सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर अतिथियों द्वारा पांच तकनीकी प्रसार पत्रकों का भी विमोचन किया गया राई-सरसों के शोध एवं उन्नत तकनीकों के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान करने एवं सरसों पौधा प्रतियोगिता के विजेताओं किसानों को  प्रषस्ति पत्र प्रदान  करके सम्मानित किया गया। इस अवसर पर सरसों अनुसंधान निदेषालय के विभिन्न अनुभागों एवं सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं की और से कृृषि एवं सरसों की खेती की उन्नत जानकारी देने के लिए प्रदर्शनियांं भी लगाई गई। प्रदर्शनी मे, सरकारी वर्ग में, केन्द्रीय भेड एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अंिवकानगर, कृषि विज्ञान केन्द्र, बानसूर एवं केन्द्रीय बकरी अनुसंधान, मथुरा एवं गैर-सरकारी वर्ग में जसोरिया बीज भण्डार, राम फर्टिलाइजर्स एण्ड केमिकल्स एवं लुपिन फाउण्डेशन को क्रमश: प्रथम, द्वितीय एवं तृृतीय पुरस्कार प्रदान करके सम्मानित किया गया। मेले में उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश एवं राजस्थान से कृशि कार्यकर्ताओं सहित करीब 2000 किसानों ने भाग लिया। कार्यक्रम का सम्पूर्ण संचालन प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पंकज शर्मा ने किया।