राजधानी में पोषण का संकट: 5 साल से कम उम्र के करीब 25 प्रतिशत बच्चो का वजन है सामान्य से कम

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  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस 4) के आंकडे बताते हैं कि जयपुर में रहने वाले 25.2 बच्चो के आयु के अनुपात में उनका वजन कम है, और इस मामले में वे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्युएचओ) के मानको के अनुरूप विकसित नहीं हो रहे हैं।
  • भरपूर पोषण न मिलने से बच्चो का विकास रुक सकता हैए उनके शरीर में आवश्यक विटामिन और खनिजो की कमी हो सकती है, ऐसे में उन्हे मलेरिया, डायरिया, खसरा जैसी संक्रामक बीमारियाँ होने की आशंका भी अधिक बढ जाती है, जो कई बार मौत का कारण भी बन जाती है।
  • कुपोषण वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक बडा खतरा है और 5 साल से कम उम्र में होने वाली करीब 45 प्रतिशत मौतों के लिए कुपोषण जिम्मेदार होता है।
  • कुपोषण का असर बच्चे की शिक्षा पर भी पडता है क्योंकि उनकी संज्ञानात्मक क्षमता का सीधा सम्बंध पोषण से है। कुपोषण की गम्भीरता और आयरन की कमी से होने वाली एनीमिया (आईडीए) उनकी सीखने की क्षमता को गहराई से प्रभावित करता है।

जयपुर
राजस्थान की राजधानी जयपुर में अल्पविकसित होने और बीमारियों की चपेट में आने का खतरा अधिक है क्योंकि यहाँ रहने वाले 5 साल से कम उम्र के करीब एक चौथाई बच्चों का वजन सामान्य से कम है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस 4) के आंकडे बताते हैं कि जयपुर में रहने वाले 25.2 प्रतिशत बच्चों के आयु के अनुपात में उनका वजन कम है, और इस मामले में वे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्युएचओ) के मानको के अनुरूप विकसित नहीं हो रहे हैं। इससे यह साबित होता है कि यहाँ के बच्चों के आहार में पोषण की कमी है। फोर्टिस ला फेम जयपुर के सीनियर कंसल्टेंट एवम एचओडी-नियोनेटोलॉजी डॉ. सत्येन के हेमरजानी कहते हैं, ‘‘इस उम्र में बच्चों का विकास तेजी से होता है, ऐसे में उनके सही विकास के लिए उपयुक्त पोषण की जरूरत होती है। मगर पोषक आहार की समान पहुंच का अभाव भी बच्चों को ही सबसे अधिक झेलना पडता है-और भरपूर पोषण न मिलने से बच्चों का विकास रुक सकता है, उनके शरीर में आवश्यक विटामिन और खनिजों की कमी हो सकती है, ऐसे में उन्हें मलेरिया, डायरिया, खसरा जैसी संक्रामक बीमारियाँ होने की आशंका भी अधिक बढ जाती है, जो कई बार मौत का कारण भी बन जाती है। कुपोषण का मतलब सिर्फ भोजन की कमी नहीं है, यह कई कारकों का सन्योजन है, जैसे कि प्रोटीन, एनर्जी और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी, देखभाल और खानपान सम्बंधी निम्नतर तरीके, अनुपयुक्त स्वास्थ्य सेवाएँ, बार-बार संक्रमण अथवा बीमारियाँ  होना और अस्वच्छ जल व वातावरण। कुपोषण का असर बच्चे की शिक्षा पर भी पडता है क्योंकि उनकी संज्ञानात्मक क्षमता का सीधा सम्बंध पोषण से है। कुपोषण की गम्भीरता और आयरन की कमी से होने वाली एनीमिया (आईडीए) उनकी सीखने की क्षमता को गहराई से प्रभावित करता है। जिन बच्चों को जीवन के पहले दो साल में उपयुक्त पोषण नहीं मिलता है उनमे सामान्य रूप से विकसित बच्चों की तुलना में कॉग्निटिव टेस्ट स्कोर कमतर रहता है, उनके नामांकन में देरी होती है, बार-बार स्कूल में अनुपस्थिति रहती है, एक ही चीज को सीखने में अधिक समय लगता है। विटामिन ए की कमी से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और संक्रामक बीमारियाँ लगने एवम इनकी गम्भीरता का खतरा बढ जाता है, जिससे उन्हें बार-बार स्कूल से छुट्टी लेनी पडती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कुपोषण वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक बडा खतरा है और 5 साल से कम उम्र में होने वाली करीब 45 प्रतिशत मौतों के लिए कुपोषण जिम्मेदार होता है। सामान्य से कम वजन वाले लोगो की असमय मौत का खतरा अधिक रहता है क्योंकि उनमें पोषण की कमी का काफी नकारात्मक असर रहता है जैसे कि माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी, खराब प्रतिरोध क्षमता और संक्रमण की चपेट में आने का खतरा ज्यादा रहता है। डॉ. सत्येन के हेमराजानी कहते हैं, ‘‘इस समस्या से निबटने के लिए हमे स्थायी, लचीला फूड सिस्टम तैयार करने की जरूरत है ताकि हर किसी के लिए स्वस्थ्य आहार सुनिश्चित हो सके। साथ ही हर तबके तक पोषण-सम्बंधी शिक्षा का प्रसार भी होना चाहिए। हमे अपने हेल्थ सिस्टम को दुरुस्त बच्चों की पोषण सम्बंधी जरूरतों के अनुकूल बनाना होगा, यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी योजनाएँ लाई जाएँ जो बच्चों के पोषण की स्थिति को सुधारे। पोषण के लिए सुरक्षित और सहयोगी वातावरण तैयार करने की भी जरूरत है और साथ ही पोषण सम्बंधी निगरानी और जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।