दर्दनाक मौत की गिरफ्त से बची जान, त्वरित और प्रभावित इलाज से फोर्टिस हॉस्पिटल ने बचाई डेंगू से पीडित किशोर की जान

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  • डेंगू और इसके चलते शरीर में पानी के जमाव और न्युमोनिया से बेहद गम्भीर स्थिति में पहुंच चुके बच्चे को हॉस्पिटल के इमरजेंसी विभाग में लाया गया था
  • बच्चे की स्थिति बेहद जटिल थी क्योंकि उसके शरीर में पानी जमा हो जाने से उसे कम्पार्टमेंट सिंड्रोम हो गया था, जिससे अंगों के फेल होने का खतरा था
  • 17 वर्षीय किशोर को हॉस्पिटल में भर्ती किए जाने के कुछ घंटों के भीतर उसकी जांच और मेडिकल प्रॉसीजर किए गए
  • इन प्रभावी उपायों को 3 सुपर स्पेशियलिस्ट डॉक्टरों, डॉ. शब्बर जौड, निदेशक क्रिटिकल केयर, डॉ.संजय चौधरी, कंसल्टेंट पीडिआट्रिक्स एवम डॉ. राजेश गरसा, कंसल्टेंट-नेफ्रोलॉजी के पर्यवेक्षण में किशोर का इलाज किया गया। 

जयपुर
मरीज को बहुत ही गम्भीर स्थिति में फोर्टिस हॉस्पिटल की आपातकालीन सेवा में लाया गया था। रोगी पहले से ही दो चिकित्सालयों में उपचार ले चुका था परंतु वहाँ किए गए इलाज का उस पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड रहा था। जिसके चलते किशोर को गम्भीर निमोनिया हो गया। विभिन्न अंगों की क्रियाशीलता प्रभावित होने लगी तथा रोगी को कम्पार्टमेंट सिंड्रोम हो गया जिसके परिणामस्वरूप किशोर के मसल्स की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगी थी। इतना ही नहीं, रोगी का रक्तचाप कम हो रहा था एवम सांस की नली व फेफडों से ब्लीडिंग हो गई थी और पेट में काफी अधिक मात्रा में पानी जमा हो गया था। ऐसे में मरीज की जान बचाने के लिए क्रिटिकल रिएक्शनरी उपायों की जरूरत थी। विभिन्न जटिलताओं को विशेषज्ञों की एक टीम के गहनता से योजनाबद्ध उपचार एवम इंटेंसिव केयर यूनिट के लिए विशेष प्रशिक्षित नर्सिंग टीम की देखरेख में तीन करेक्टिव प्रॉसीजर के बाद मरीज की रिकवरी प्रारम्भ हो गई। देशभर में डेंगू के मामले तेजी से बढना चिंता का विषय है। सबसे खतरनाक बात यह है कि अब डेंगू अपनी सीजनल प्रकृति को छोडकर हर मौसम और देश के हर हिस्से तक अपनी पहुंच बना चुका है। इससे भी गम्भीर बात यह है कि इसका सबसे गम्भीर प्रभाव बच्चों पर दिखाई दे रहा है। बचाव सम्बंधी उपायों की कमी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। फोर्टिस एस्कॉट्र्स हॉस्पिटल, जयपुर के पीडियाट्रिक्स कंसल्टेंट डॉ. संजय चौधरी कहते हैं, ''यह हमारे लिए एक बडी जीत है क्योंकि हमारे त्वरित प्रयासों के चलते एक किशोर की जान बच सकी। किशोर को हमारे पास बेहद जटिल स्थिति में लाया गया था, गम्भीर निमोनिया से उसकी अनमोल जान खतरे में पड गई थी। कम्पार्टमेंटल शॉक सिंड्रोम और फेफडों में ब्लीडिंग की वजह से स्थिति और बिगड हई थी, जिसके चलते तुरंत गम्भीर अटेंशन की जरूरत थी। फोर्टिस अस्पताल में लाने से पहले वाले अस्पतालों में किए गए उपचार के असरकारी न होने से मामले की जटिलता बढ गई थी। फोर्टिस हॉस्पिटल, जयपुर के डायरेक्टर-क्रिटिकल केयर, डॉ. सब्बर जौड कहते हैं, ''बच्चे के इलाज/स्वास्थ्य लाभ में करीब 40 दिनों का समय लगा, जिसमें से 30 दिन कम्लीट रिकवरी के लिए वेंटिलेटर की अनिवार्यता थी। बच्चे को तुरंत कम्पार्टमेंट सिंड्रोम प्रबंधन दिया गया, जिसमें पानी का सक्शन, ब्रॉन्कोस्कोपी, क्लॉट रिमूवल, प्रोलॉन्ग्ड डायलिसिस और अन्य कॉम्बेटिव उपाय शामिल थे। डॉ.संजय चौधरी एवम डॉ. गरसा के नेतृत्व के तहत हम स्थिति को बेहतरी से सम्भालने में कामयाब रहे। यहाँ मैं आम लोगों में स्वच्छता की कमी और जागरूकता के अभाव पर भी प्रकाश डालना चाहता हूँ जो बडी समस्या का कारण बन जाते हैं। पिछले 4-5 साल से डेंगू बेहद तेजी से फैल रहा है और बच्चों पर इसका बहुत खतरनाक असर देखने को मिल रहा है। हमें इस स्थिति की जिम्मेदारी लेते हुए देश को स्वच्छ बनाने का प्रयास करना चाहिए अन्यथा हमारी कमियों की वजह से नन्हे बच्चों को जीवन से हाथ धोना पड सकता है। बच्चों का जीवन बचाने में कुछ बुनियादी उपाय भी बेहद कारगर साबित हो सकते हैं।