हार्ट वाल्व सिकुड़ गया, गर्भवती महिला व जुड़वा शिशुओं की जान बचाई

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जयपुर
हाई रिस्क प्रेगनेंसी के साथ हार्ट वाल्व सिकुडऩे जैसी जटिल समस्या के कारण गंभीर स्थिति में आई एक साढ़े आठ माह की गर्भवती महिला और उसके जुड़वा शिशुओं की जान बचाने में नारायणा मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने सफलता प्राप्त की है। 
26 साल की अनिता पिछले दिनों नारायणा हॉस्पिटल, जयपुर की आपातकालीन इकाई में सांस लेने में परेशानी की शिकायत के कारण लाई गई। चिंता की बात यह थी कि उसका गर्भकाल नजदीक था और पेट में जुडवा बच्चों की स्थिति थी। डॉक्टरों ने जब जांच की तो पता चला कि उसके हार्ट का माइट्रल वाल्व बहुत सिकुड़ा हुआ था। हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. संजय शर्मा ने बताया कि, इस वाल्व का आकार 4 से 5 सेमी होता है, मगर मरीज में यह सिकुड़ कर एक सेमी से भी कम हो गया था। इस कारण खून का प्रवाह में रुकावट हुई और इस कारण मरीज को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। यही नहीं उसके हार्ट के चारों तरफ की झिल्ली में फ्लूयड भरा हुआ था। इस जटिल स्थिति के साथ-साथ प्री-मैच्योर प्रेगनेंसी भी सामने थी। ऐसे में पहले मरीज को दो दिन दवाईयों के सहारे स्थिति काबू में करने की कोशिश की गई। बाद में हॉस्पिटल की संयुक्त टीम जिसमें डॉ. संजय के साथ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. मंजू गोयल, सीनियर कार्डियक सर्जन डॉ. अंकित माथुर व नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विजय शंकर शर्मा ने हार्ट डिफेक्ट ठीक करने, डिलेवरी कराने व इस दौरान आने वाली चुनौती को लेकर रणनीति बनाई।
 
गर्भस्थ शिशुओं की हलचल हुई कम तो बीएमवी की
मरीज की तीसरे दिन जब जांच की गई तो पता चला कि उसके पेट में शिशुओं की हलचल कम हो गई है। ऐसे में हालत जटिल होने की संभावना हो जाती है। चूंकि हार्ट वाल्व काफी सिकुड़ा हुआ था, ऐसे में तुरंत सीजेरियन डिलेवरी करना जोखिमभरा हो सकता था। इसीलिए पहले शिशुओं और मां की जान बचाने के लिए हार्ट वाल्व ठीक करने के लिए इमरजेंसी बीएमवी प्रोसीजर किया गया। डॉ. संजय शर्मा ने बताया कि इस प्रक्रिया में कैथ लेब में मरीज के पांव की नस से एक तार को हार्ट तक पहुंचा कर बैलून के जरिए सिकुड़े हुए वाल्व को चौड़ा किया गया। इससे हार्ट वाल्व की परेशानी सही हो गई। 

इसलिए था जोखिम व जाटिल केस 
कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. संजय शर्मा ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान सिकुड़े हुए हार्ट वाल्व को ठीक करने के लिए बीएमवी प्रोसीजर का उचित समय 24 से 26 हफ्ते का होता है। इस केस में प्रेगनेंसी पीरियड 33 हफ्ते का होने के बाद प्रोसीजर करना पड़ा जो काफी जटिल और जोखिमभरा था। केस जटिल इसलिए भी था कि पेट में जुड़वा बच्चे थे, जिससे हार्ट तक कैथेटर पहुंचाना मुश्किल होता है।

वाल्व सही हुआ तो तुरंत कराई डिलेवरी
पीडि़त महिला की हार्ट वाल्व की समस्या ठीक होते ही तुरंत गायनोकोलॉजिस्ट टीम ने ऑपरेशन करके डिलेवरी कराई और दो प्रीमैच्योर स्वस्थ जुड़वा शिशुओं का जन्म कराया। इन शिशुओं को नवजात आईसीयू इकाई में रखा और महिला को डॉक्टरों की टीम ने अलग ऑबजर्वेशन में रखा। मां और शिशु पूरी तरह स्वस्थ होने पर अस्पताल से छुट्टी कर दी गई।