अकेलेपन को दूर करने के लिये लिखा करता था कवितायें: पं. लोकनारायण शर्मा

img

जयपुर
प्रभा खेतान फाउण्डेशन द्वारा ग्रासरूट मीडिया फाउण्डेशन के सहयोग से राजस्थानी साहित्य, कला व संस्कृति से रूबरू कराने के उद्देश्य से ’आखर’ श्रृंखला में राजस्थानी भाषा के साहित्यकार पं. लोकनारायण शर्मा से उनके कृतित्व व व्यक्तित्व पर चर्चा की गई। उनके साथ संवाद झालावाड़ के साहित्यकार कृष्ण बिहारी भारतीय ने किया। श्री सीमेंट द्वारा समर्थित इस कार्यक्रम का आयोजन होटल आईटीसी राजपुताना में आयोजित हुआ। अपने साहित्यिक सफरनामे पर बताते हुये बारां जिले में जन्में पं. लोकनारायण शर्मा ने बताया कि वह बचपन में स्कूल में रचनायें सुना करते थे, जब वे 5वीं कक्षा में थे तब उनके अध्यापक रघुराज सिंह हाड़ा स्कूल में बाल सभा में कवितायें सुनाया करते थे और तब से ही उन्हें कविताओं में रूचि होने लगी। उन्होने बताया कि मेरे अध्यापक मेरे लिए देवता स्वरूप थे वह मैंने भी उनकी एकलव्य की तरह साधना की है। 5वीं कक्षा में उन्होंने अपनी पहली कविता लिमड़ी (नीम का पेड़) लिखी। अपने जीवनकाल के बारें में बताते हुये पं. लोकनारायण जी ने बताया कि बचपन में पिताजी ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया था और वे घर के पास ही स्थित हनुमान जी के मंदिर में रहने लगे और वहीं से डाक पत्र बांटने का काम शुरू किया, बाद में उनकी डाक विभाग में नौकरी लग गई। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वह कवितायें लिखने लगे। इसके अलावा पं. लोकनारायण ने लगभग 35 से 40 नाटकों में भी काम किया, उन्होने बताया कि नाटकों से ही मेरी भाषा समृद्ध हुई है। उन्होंने भर्तृहरि शतक के तीन भागों का राजस्थानी में पद्यानुवाद किया जिसके कारण उन्हें लोग लोक भर्तृहरि के नाम से जानने लगे। नीति, श्रृंगार और वराग्य में लिखे इन तीन भागों के पद्यानुवाद को उन्होने अमर-फल के नाम से प्रकाशित किया। यह पद्यानुवाद राजस्थानी हाड़ौती भाषा में लिखा गया है। कार्यक्रम में पं. लोकनारायण ने श्रौताओं के लिए अपनी कविताओं और गीतों जैसे कि ’बंजारा उठतो मेलो’, ’कुण संग चालु म्हारा रामधणी’ आदि का वाचन भी किया। इस दौरान उन्होंने अपनी पहली किताब ’अब तो पीऊं उजालो’ (काव्य संग्रह) के बारें में विस्तार से जानकारी दी। इससे पूर्व आखर कार्यक्रम में प्रतिष्ठित राजस्थानी साहित्यकारों डॉ. आईदान सिंह भाटी, डॉ. अरविंद सिंह आशिया, रामस्वरूप किसान, अंबिका दत्त, कमला कमलेश और भंवर सिंह सामौर, डॉ. ज्योतिपुंज, डॉ. शारदा कृष्ण, डॉ. जे़बा रशीद, देवकिशन राजपुरोहित, मोहन आलोक मधु आचार्य, जितेन्द्र निर्मोही, डॉ मंगत बादल, दिनेश पंचाल तथा मनोहर सिंह राठौड़ के साथ चर्चा की जा चुकी हैं।