30 से ज्यादा टिकटों के दावेदार नेता पुत्र जबकि पांच नेताओं की बेटियां और पुत्र वधु मैदान में उतरी

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जयपुर
विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस में टिकटों के लिए जोर आजमाइश शुरु हो चुकी है। हर बार की तरह इस बार भी बड़ी संख्या में कांग्रेस नेताओं के बेटे बेटियां टिकट के लिए दावेदारी कर रहे हैं। कांग्रेस नेताओं ने अपनी राजनीतिक विरासत संभलवाने के लिए बेटों पर ही ज्यादा भरोसा किया है। कांग्रेस में वंशवाद की राजनीति नई बात नहीं है। टॉप से लेकर मिडिल तक कांग्रेस में वंशवाद का ही देखने को मिलता रहा है। विधानसभा चुनावों में टिकटों के लिए इस बार दिवंगत और मौजूदा नेताओं के बेटे टिकटों की दावेदारी में सबसे आगे हैं। राजनीतिक विरासत संभालने में कांग्रेस नेताओं के बेटे ही आगे आ रहे हैं। केवल पांच नेता ही ऐसे हैं जिनकी बेटियां और पुत्रवधु उनकी विरासत संभालने आगे आ रहे हैं, शिवचरण माथुर की पुत्री वंदना माथुर, मास्टर भवंरलाल की पुत्री बनारसी मेघवाल, महिपाल मदेरणा की पुत्री दिव्या मदेरणा और दिवंगत नेता रामनारायण चौधरी की पुत्री रीटा चौधरी और नारायण सिंह की पुत्रवधु रीटा सिंह टिकट की दावेदार हैं, बाकी जगहों पर नेताओं के पुत्र ही दावेदार हैं। कांग्रेस में दर्जन भर मौजूदा नेताओं ने अभी से अपने बेटों को राजनीति के मैदान में उतार दिया है, ऐसे अनेकों नेता पुत्र अब टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। प्रद्युम्न सिंह, परसराम मोरदिया, हरेंद्र मिर्धा, परसादीलाल मीणा, बनवाीलाल शर्मा, ममता शर्मा, डॉ. कमला, दीपेंद्र सिंह शेखावत जैसे नेताओं ने अपने बेटों को राजनीति के मैदान में पहले से उतार दिया और अब टिकट के दावेदार हैं। हालांकि नेताओं के बेटे बेटियों को टिकट भले आसानी से मिल जाए लेकिन चुनाव जीतना उतना असान नहीं रहता। रीटा चौधरी, चेतन डूडी, संजय पहाडिय़ा, दानिश अबरार और प्रशांत बैरवा को टिकट मिला लेकिन पिछला चुनाव हार गए थे। इस बार नेता पुत्रों को फिर टिकट की उम्मीद है। नेता पुत्रों के टिकट की दावेदारी करने पर कई सवाल भी उठ रहे हैं, बिना राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले नेता यह भी सवाल उठा रहे हैं कि नेता पुत्रों को राजनीति में जमने में आसानी रहती है, जबकि आम राजनीतिक कार्यकर्ता को टिकट की दावेदारी करने लायक स्थिति तक पहुंचने में ही बरसों लग जाते हैं। नेता पुत्रों को अपने पिता की विरासत का फायदा मिलता है। हालांकि इन आलोचनाओं के बीच टिकट की दावेदारी कर रहे नेता पुत्र यह तर्क देते हैं कि राजनीति में हर पांच साल में परीक्षा होती है जो जनता की उम्मीदों पर खरा उतर पाते हैं वे ही टिक पाते हैं, राजनीति में नेता पुत्रों को लॉन्चिंग पैड आसानी से मिल जाता है और यही लॉन्चिंग पैड पाने में आम कार्यकर्ता को बहुत मुश्किल आती है, यही वजह है कि टिकटों की दावेदारी के वक्त अब वंशवाद की चर्चा फिर तेज होने लगी है।