स्मार्ट विलेज धनौरा में राम दरबार की हुई प्राण-प्रतिष्ठा

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धौलपुर
स्मार्ट विलेज धनौरा मे राम दरबार के प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर चल रहि राम चरित मानस कथा में आचार्य गोविन्द ने कहा कि कहते हैं हरि अनंत, हरि कथा अनंता। भरत जी हाथ जोड़कर बोले, हे प्रयागराज। मुझे धन नहीं चाहिए। वो तो मैंने पहले ही छोड़ दिया। फिर सबको पता लगा। हम बताते पहले हैं फिर त्याग करते हैं और वह भी कितना ? यह आप अच्छी तरह जानते हो। संपत्ति लेनी होती तो भरत जी अयोध्या राज्य किसलिए छोड़ देते ? उन्होंने कहा मुझे धन, धर्म नहीं चाहिए। काम-सुख भोगने की इच्छा नहीं है और निर्वाण की गति भी नहीं चाहिए। मुझे जन्म-जन्मांतर राम चरणों में प्रीति चाहिए। बस ! मुझे वरदान दो। प्रयागराज चिचार में पड़े। मेरे पास चारि पदारथ भरी भंडारू चार पदार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष हैं। पर आज यह संत जो मांग रहे हैं वो मेरे पास नहीं है।
यदि मैं दे सकूं तो मेरा दान सफल हो जाए। तभी प्रयाग की त्रिवेणी धारा में से आवाज आई, महाराज आप तो संत हो, आपको क्या दें ? फिर भी वाणी को पवित्रा करने के लिए कहता हूॅ कि परम कृपालु परमात्मा आपकी सारी इच्छाएं पूर्ण करेंगे। सर्वप्रथम श्रीराम की कथा भगवान श्री शंकर ने माता पार्वतीजी को सुनाई थी। उस कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया। उसी कौवे का पुनर्जन्म कागभुशुण्डि के रूप में हुआ। काकभुशुण्डि को पूर्व जन्म में भगवान शंकर के मुख से सुनी वह रामकथा पूरी की पूरी याद थी। उन्होंने यह कथा अपने शिष्यों को सुनाई। इस प्रकार रामकथा का प्रचार-प्रसार हुआ। भगवान शंकर के मुख से निकली श्रीराम की यह पवित्रा कथा अध्यात्म रामायण के नाम से विख्यात है। राम कथा को सुनकर सभी भक्तगण भावविभोर हुए।