ड्रग-कोटेड बलून तकनीक आपके लिम्ब्स को बचाने में मदद कर सकती है

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जयपुर
देश में लिम्ब के खराब होने के बढ़ते मामलों को दूर करने के लिये आज एपेक्स हॉस्पिटल में लवयोरलिम्ब्स अभियान शुरू किया गया। यह कैम्पेन लिम्ब के खराब होने और लिम्ब्स को बचाने में मददगार इलाज के बारे में जागरुकता फैलायेगा। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, हर साल एक मिलियन से भी ज्यादा अंग विच्छेदन जैसी प्रक्रियाएं की जाती हैं। उनमें 70 प्रतिशत से भी ज्यादा डायबिटीज से संबंधित हैं। इसके अलावा, अनुमान के अनुसार घुटने के नीचे अपंगता सबसे आम होती है, जोकि 71 प्रतिशत डिस्वैस्कुलर एम्प्यूटेशन को दर्शाता है। रिपोर्ट के मुताबिक हर साल 185,000 लोग एम्प्यूटेशन से होकर गुजरते हैं, जिसका अर्थ है हर दिन  300 से 500 एम्प्यूटेशन किये जाते हैं। इन आंकड़ों के आधार पर, लॉन्च के मौके पर कई प्रमुख डॉक्टर्स ने पेरीफेरल आर्टरी डिजीज (पीएडी) के उपचार के लिये ड्रग-कोटेड बलून (डीसीबी) तकनीक को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इससे मरीजों को अपने लिम्ब्स को बचाने में मदद मिल सकती है और एम्प्यूटेशन से बचाव हो सकता है। इस चर्चा का नेतृत्व, यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल लिपजिंग जर्मनी के सीनियर फिजिशियन डॉ. स्वेन ब्राउनलिच ने किया। इस चर्चा में एपेक्स हॉस्पिटल में वैस्कुलर तथा एंडोवैस्कुलर सर्जन डॉ. आदर्श काबरा और एपेक्स हॉस्पिटल में कंसल्टेंट इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी, डॉ. प्रवीण सिंघल भी अन्य डॉक्टर्स के साथ उपस्थित थे। पेरीफेरल आर्टरी डिजीज (जिसे पेरीफेरल आर्टियल डिजीज के नाम से भी जाना जाता है) पेरीफेरल आर्टरीज का सिकुडऩा होता है, जिससे पैरों, पेट, हाथों और सिर तक रक्तका संचार कम हो जाता है। रक्त संचार के कम होने के परिणामस्वरूप गंभीर समस्याएं हो जाती हैं और यदि शुरुआती चरण में इसका उपचार ना किया जाये तो लिम्ब को सर्जरी द्वारा हटाने की नौबत आ सकती है, यानी एम्प्यूटेशन। इसलिये, डॉक्टर्स घुटने के नीचे ड्रग-कोटेड बलून जैसी सर्जरी करवाने की सलाह देते हैं, जोकि इस परेशानी का उपचार करने में प्रभावी पाये गये हैं। डायबिटीज से पीडि़त मरीजों में पीएडी सबसे आम होता है और चलने के दौरान उन्हें पैर में अत्यधिक दर्द होता है। देश में 69.2 मिलियन डायबिटीज के मरीजों के साथ, जिनमें कि 36 मिलियन में इसका पता भी नहीं चलता, भारत डायबिटीज के मरीजों की संख्या के मामले में विश्व रैकिंग में सबसे ऊपर है। डायबिटीज के बढ़ते मामलों के कारण डायबिटिक फुट मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है, जोकि बहुत ही गंभीर चिंता का विषय है। डॉ. स्वेन ब्राउनलिच, सीनियर फिजिशियन, डिविजन ऑफ इंटरवेंशनल एंजियोलॉजी, यूनिवर्सिटी लिपजिंग, जर्मनी ने कहा, ‘‘पेरीफेरल आर्टरी डिजीज (पीएडी) का सबसे आम प्रकार डायबिटिक फुट होता है। अनियंत्रित डायबिटीज और खराब रक्त संचार के कारण, मरीजों में इंफेक्शन हो जाता है, उन्हें पैर या तलुए में अल्सर हो जाता है। यदि इसका इलाज ना कराया जाये तो उसके परिणामस्वरूप लिम्ब एम्प्यूटेशन हो सकता है। ऐसे में इन मरीजों का इलाज कराने के दौरान, ड्रग-कोटेड बलून (डीसीबी) को अपनाने की जरूरत है। डीसीबी एक इंटरवेंशनल टेक्नोलॉजी है, जोकि धमनियों को असामान्य रूप से सिकुडऩे से बचाता है और कोशिकाओं को विभाजित होने से रोकता है, उपचार के बाद ब्लॉकेज को पुन: होने से रोकता है। मैं एक डॉक्टर होने के नाते, जिसे कि अक्सर ही ऐसे मामलों से दो-चार होना पड़ता है, उपयोग में आसान होने के कारण इस तकनीक को अपनाना पसंद करता हूं। डॉ. आदर्श काबरा, वैस्कुलर और एंडोवैस्कुलर सर्जन, एपेक्स हॉस्पिटल कहते है, ‘‘भारत में बड़ी संख्या में मरीज डायबिटिक फुट से पीडि़त हैं। ड्रग-कोटेड बलून तकनीक इन मरीजों का उपचार करने और लिम्ब को बचाने की एक प्रभावी तकनीक के रूप में उभरकर सामने आयी है। इन तकनीकों ने मरीजों की स्थिति में बेहतर सुधार दिखाया है। इसके साथ ही, ‘लवयोरलिम्ब‘ जैसे कैम्पेन लोगों को सही और समय पर इलाज करने को लेकर जागरूक करने का एक प्रयास है, जिससे उन्हें अपने लिम्ब्स को बचाने में मदद मिल सकती है। विशेषज्ञ डॉक्टरों ने सफल मरीजों की केस स्टडीज पर भी रोशनी डाली जोकि ड्रग कोटेड बलून तकनीक से गुजर चुके हैं। 

ड्रग-कोटेड बलून तकनीक के विषय में-
ड्रग-कोटेड बलून (डीसीबी) तकनीक इसके टिप पर एक छोटे से बलून के साथ एक डिवाइस है, जिसे पैर की धमनी के माध्यम से अंदर डाला जाता है और जब तक यह सिकुड़े हुए हिस्से में नहीं पहुंच जाता तब तक उसे आगे बढ़ाया जाता है। इसके बाद बलून को फुलाया जाता है, जोकि धमनी की प्लाक को समतल कर देता है, धमनी खुलने लगती है और रक्तसंचार पहले जैसा हो जाता है। इसके बाद बलून को पिचका दिया जाता है और शरीर से निकाल लिया जाता है। एक बार जब यह पूरा हो जाता है तो एक नया बलून जोकि एंटी-प्रोलिफरेटिव दवा से कोटेड होता है, उसी धमनी से दोबारा पैर में डाला जाता है और जब तक यह पहले उपचारित किये गये सिकुड़े हिस्से तक नहीं पहुंच जाता है वहां तक इसे पहुंचाया जाता है। इसके बाद बलून को फुलाया जाता है और दवा को धमनी की दीवार और उसके आस-पास के टिश्यूू तक पहुंचाया जाता है। निर्दिष्ट समय अवधि के बाद, इस बलून को पिचका दिया जाता है और शरीर से बाहर निकाल लिया जाता है।