भारत का ज्ञान और विज्ञान से नाता आदिकाल से : राजू

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जयपुर
जयपुर डायलॉग -19 के दूसरे दिन अलग अलग पांच सत्र हुए जिनमें डेविड फ्रोली, सी के राजू, शंकर शरण, अभिनव प्रकाश, नीरज अत्रि, रविशंकर, सुनील शर्मा, संदीप बालकृष्ण, शैफाली वैद्य, अभिजीत चावड़ा, अरविन्दन नीलकन्दन, ले.जनरल शौकीन चौहान, अभिजीत अय्यर मित्रा, युसुफ उन्झावाला, डॉ गौरव वल्लभ, मारिया वर्थ, रुचि सूद आइएएस संजय दीक्षित एवम् अतुल व्यास ने संबोधित किया। ख्यातनाम गणितज्ञ सीके राजू ने कहा कि अंध विश्वास और विश्वास में फर्क समझना होगा तभी हम सही तथ्य तक पहुँच सकते हैं उन्होंने कहा कि ज्ञान और विज्ञान केवल पश्चिमी नहीं ज्ञान और विज्ञान हमारे देश में आदिकाल से स्थापित है और भारतीय इतिहास में हुई कई घटनाएं उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

इतिहास से छेड़छाड़ करने से देश की नींव कमजोर हो रही है : शैफाली
इस अवसर शैफाली वैद्य ने कहा कि हमारे देश में इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पढ़ाया जा रहा है जिसके परिणाम स्वरूप हमारे देश में एक विशेष प्रकार की विचारधारा की पीढ़ी का निर्माण हो रहा है जो सत्य से परे है और उसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि बड़े बड़े संस्थानों में भारत विरोधी विचारधारा जन्म ले रही है जो अपने देश के लिए नुकसान देह है। 

नीतियों को क्रियान्वित करने की जरूरत : गौरव
नीति शब्द आदिकाल से चला आ रहा है और नीतिगत बातें भी होती है लेकिन नीति से चलना और उस योजना पर स्थायित्व से कार्य करना मुश्किल है। नीतियां बनाने से नहीं उन्हें क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। सही रूप से देखा जाये तो यही कार्य पहले योजना आयोग के नाम से हो रहा था और अब हम नीति आयोग की बात करते है पर कुछ भी नया कार्य नहीं हो रहा जबकि देश को कुछ नवाचार की आवश्यकता है। 

वामपंथी विचारधारा ने किया देश को प्रभावित: शंकर
शंकर शरण ने बताया कि देश मे पिछले कई सालो में वामपंथी साहित्य को भी पढ़ाया जा रहा है और उसके परिणामों को भी नकारा नहीं जा सकता इस कारण साहित्य, इतिहास तथा शैक्षणिक संस्थानो पर भी वामपंथी विचारधारा ने देश को प्रभावित किया है और इस वातावरण के लिए सरकारों की भी उदासीनता रही है शंकर शरण ने गुरु तेग बहादुर तथा उनके बच्चो के बलिदान को छुपाने वाले इतिहास का भी जिक्र किया और रोमिला थॉपर का गजनवी के सोमनाथ मंदिर तोडने वाले उद्देश्य के इतिहास का भी खंडन किया और कहा कि भारत की ज्ञान परम्परा को एक धर्म पर आधारित होने के कारण पढाना ही बंद कर दिया। नागेश्वर राव ने कहा कि किसी भी देश की परंपरा में अनेकों प्रकार की पारदर्शिता रहती है तथा उनका अपना अपनी कार्यशैली व संस्कृति के अलग-अलग तरीके होते हैं।