संस्कारित बच्चे समाज का श्रृंगार : मुनिश्री मणिलाल

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गंगाशहर
ज्ञानशाला के माध्यम से भावी पीढ़ी में संस्कारों का जागरण किया जाता है। इसमें प्रशिक्षिकाओं का अच्छा श्रम लग रहा है। बचपन में जिन संस्कारों को बालक ग्रहण करता है उसका प्रभाव उसके सम्पूर्ण जीवन पर पड़ता है। ये उद्गार आचार्यश्री तुलसी की मासिक पुण्यतिथि व ज्ञानशाला दिवस के उपलक्ष्य में नैतिकता का शक्तिपीठ पर आयोजित संगोष्ठी में शासनश्री मुनिश्री मणिलाल जी स्वामी ने कही। उन्होंने कहा कि फूलों को यदि मालाकार न मिले तो वह गिरकर पैरों में कुचले जाते है किन्तु यदि उन्हें मालाकार मिल जाए तो वही फुल हार बनकर श्रृंगार बनते है। ठीक इसी तरह बच्चे भी फूल है। प्रशिक्षक रूपी मालाकार इन्हें संस्कारित बनाते है और यही संस्कारित बच्चे भविष्य के समाज का श्रृंगार बनते है। सम्यक् संस्कारों के अभाव में बच्चों का सर्वांगीण निर्माण नहीं होता और हम स्वस्थ भावी पीढ़ी की कल्पना नहीं कर सकते।कार्यक्रम में उद्बोधन देते हुए मुनिश्री सुमतिकुमारजी ने कहा कि ज्ञानशाला का उपक्रम गुरुदेव तुलसी की एक महत्त्वपूर्ण देन है। उन्होंने ज्ञानार्जन में उच्चारण शुद्धता का महत्व बताया तथा अभिभावकों से बालकों को नियमित ज्ञानशाला भेजने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि ज्ञानशाला मंजिल पर पहुंचने की प्रथम सीढ़ी है। अगर मन में मनोबल हो तो हम किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जिला उद्योग केन्द्र कोटा के महाप्रबंधक राजेन्द्र सेठिया ने 'ज्ञानशला: संस्कारों के जागरण की शाला' पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि ज्ञानशाला संस्कार निर्माण की फैक्ट्री हैं। बालकों में सद्संस्कारों का जगारण बाल्यकाल में होता है। उन्होंने मार्मिक उदाहरणों के माध्यम से अभिभावकों को ज्ञानशाला के महत्त्व से अवगत करवाया तथा ज्ञानशाला से जुड़े संस्मरण सुनाते हुए पूर्व ज्ञानार्थियों का एक सम्मेलन आयोजित करने व ज्ञानशाला से जुडऩे के लिए अभिभावकों, प्रशिक्षिकाओं व बालकों को प्रेरित किया। आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष जैन लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि तेरापंथ धर्म संघ में ज्ञानशाला के माध्यम से बच्चों में संस्कार, सेवा एवं धर्म का बीजारोपण किया जाता है। जिससे वे देश में परिवार के अच्छे संस्कारिक बेटे-बेटी बन सके। उन्होंने कहा कि ज्ञानशाला संस्कार निर्माण का महत्वपूर्ण उपक्रम है। ज्ञानशाला आचार्य तुलसी की कल्पना की कोख से जन्मा संस्कार निर्माण का उपक्रम हैं। छाजेड़ ने कहा कि पश्चिमी हवाओं के थपेड़ों का ही असर है कि अब बच्चों में जैनत्व के संस्कार खत्म हो रहे है। ज्ञानशाला में निवेश किए गए 2 घंटे अभिभावकों के भविष्य को सुरक्षित करते हैं। वक्त का दौर कुछ ऐसा है कि मां-बाप अपने बच्चों को आइंसटाइन बनाना चाहते है और इसके लिए स्कूल काफी नहीं है। छाजेड़ ने कहा कि पूरे तेरापंथ धर्म संघ के योगक्षेम हेतु आचार्य महाश्रमण जी को नैतिकता का शक्तिपीठ पर ''योगक्षेम वर्ष" मनाने के लिए अर्ज की गई है। इस अर्ज में आचार्य तुलसी शान्ति प्रतिष्ठान के ट्रस्टी पूरे देशभर से बैंगलूरू पहुंचे थे। योगक्षेम वर्ष में आचार्य प्रवर अधिक से अधिक साधु-साध्वियों के साथ एक वर्ष का प्रवास एक जगह करके नवोदित साधु-साध्वियों को प्रशिक्षण देते है। मुनिश्री आदित्यकुमारजी ने कहा कि ज्ञानशाला में जाने से अच्छी संगति प्राप्त होती है। उन्होंने गीत के माध्यम से बच्चों को प्रेरणा दी। मुनिश्री कुशलकुमारजी ने रोचक प्रश्नों के माध्यम से बच्चों को सद्संस्कारों के बारे में बताया। ज्ञानशला प्रशिक्षिकाओं द्वारा गीत का गायन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ ज्ञानार्थी भरत संचेती तथा गौरव छलाणी द्वारा महाप्रज्ञ अष्टकम् के संगान से हुआ। इसके बाद ज्ञानार्थियों द्वारा ''ज्ञानशाला ज्ञान गीत" का सुमधुर संगान किया। प्रशिक्षिका सुनीता पुगलिया ने वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। ज्ञानार्थियों द्वारा प्रस्तुत ''तुलसी-महाप्रज्ञ" लद्यु नाटिका की सभी ने मुक्तकंठ से सराहना की। कार्यक्रम को तेरापंथ युवक परिषद् के मंत्री देवेन्द्र डागा, महिला मण्डल मंत्री कविता चौपड़ा, तेरापंथी सभा के अध्यक्ष डॉ. पी.सी. तातेड़, ज्ञानशाला के क्षेत्रीय संयोजक रतन छलाणी ने भी सम्बोधित किया। संगोष्ठी के दौरान मुख्य वक्ता महाप्रबंधक राजेन्द्र सेठिया का जैन पताका, साहित्य व स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया गया। मंच का संचालन रतन छलाणी ने किया।