कौलारी के सामुदायिक भवन में बनाए जा रहे मॉडल शौचालय का किया अवलोकन

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धौलपुर
ट्वीन पिट टॉयलेट तकनीकी एवं शौचालय तकनीकी सुधार रेट्रो फिटिंग से शौचालय निर्माण का जिला परिषद कार्यालय में एक दिवसीय कारीगरों को प्रशिक्षण दिया गया। पंचायत समिति सैपऊ की ग्राम पंचायत कौलारी के सामुदायिक भवन में कारीगरों को फिल्ड प्रशिक्षण के लिए मॉडल शौचालय का निर्माण कराया गया। जिसका अवलोकन जिला कलक्टर नेहा गिरि द्वारा किया गया। जिला कलक्टर ने कहा कि स्वच्छताग्राही द्वारा अक्रियाशील शौचालयों का सर्वे कर चिन्हित करने के बाद उनको क्रियाशील बनाया जाएगा। क्रियाशील शौचालय बनाने के लिए कारीगरों को प्रशिक्षण दिया गया है। उन्होंने कहा कि क्रियाशील बनाने के लिए दो गड्ढों वाले शौचालय की आवश्यकता होती है। इसलिये इनको दो गढ्ढो वाला शौचालय कहा जाता है क्योंकि इनमें जलमल को इक_ा करने के लिये दो गड्ढों की व्यवस्था की जाती है जिनका उपयोग बारी-बारी से किया जाता है। इसके अलावा ऐसे शौचालय में एक पैन, वॉटर सील/ट्रैप, बैठने का प्लेटफार्म, जंक्शन चेम्बर और बाहरी ढाँचा भी होता है। उन्होंने कहा कि इसमें दो गड्ढे होते हैं जिनका बारी-बारी से इस्तेमाल किया जाता है। गड्ढे की दीवारों में मधुमक्खी के छत्ते के आकार में ईंटों से चिनाई की जाती है। गड्ढे के तले पर पलस्तर नहीं किया जाता और तला मिट्टी का बना होता है। शौचालय का इस्तेमाल करने वालों की संख्या को ध्यान में रखते हुए गड्ढे का आकार तय घटता-बढ़ता है। उन्होंने बताया कि हर गड्ढे की क्षमता आमतौर पर तीन साल रखी जाती है। करीब तीन साल में जब पहला गड्ढा भर जाता है तो जंक्शन चौम्बर से उसे बन्द कर दिया जाता है और दूसरे गड्ढे को चालू कर दिया जाता है। मुख्य कार्यकारी जिला परिषद शिवचरण मीना ने बताया कि गड्ढे वाले पिट शौचालय के लिये निकास पाइप की आवश्यकता नहीं होती। गड्ढे में बनी गैसें मधुमक्खी के छत्ते की संरचना वाले ढाँचे के जरिए मिट्टी में मिल जाती हैं। यह प्रणाली ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करने वाली इन गैसों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने में मदद करती है। उन्होंने दो गड्ढे वाले पोर फ्लश शौचालयों के फायदे बताते हुए कहा कि यह घरेलू मानव मल का उसी स्थान पर स्थायी रूप से निपटारा करने वाला उपाय है, इसमें एक बार इस्तेमाल करने पर सिर्फ 1.5 लीटर से 2 लीटर तक पानी की आवश्यकता होती है, गड्ढे में जमा मानव मल को दो साल बाद बाहर निकालने पर वह अर्ध ठोस अवस्था में होता है, उसमें न तो किसी प्रकार की गन्ध होती है और न बीमारी फैलाने वाले जीवाणु। इसे आसानी से खोदकर बाहर निकाला जा सकता है, गड्ढे में जमा अपशिष्ट में पेड़-पौधों के पोषक तत्वों का प्रतिशत काफी अधिक होता है और इसका उपयोग खेती व बागवानी में किया जा सकता है, इस तरह के शौचालयों की हाथों से सफाई करने की आवश्यकता नहीं होती,  इस तरह के शौचालयों को आसानी से अपग्रेड किया जा सकता है और सीवर लाइनों के उपलब्ध होने पर इन्हें इन लाइनों से भी जोड़ा जा सकता है, इनका रख-रखाव आसान है। जिला कलक्टर नेहा गिरि ने ब्लॉक स्वच्छता मिशन के तहत रेट्रो फिटिंग बनाने को लेकर कारीगरों को दिए गए प्रशिक्षण के प्रमाण-पत्रा दिए गए। इस अवसर पर विकास अधिकारी सैपऊ रामबोल सिंह, सूचना एवं जन सम्पर्क अधिकारी राजकुमार मीना सहित विभागीय अधिकारी उपस्थित रहे।